Indian Penal Code, 1860
धारा 303
repealedPunishment for murder by life-convict
Whoever, being under sentence of imprisonment for life, commits murder, shall be punished with death.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
इस धारा का उद्देश्य सबसे कड़े अपराधियों—जो पहले से आजीवन कारावास भुगत रहे हों—को आगे हत्या करने से रोकना था, क्योंकि किसी हल्की सजा का विकल्प ही नहीं छोड़ा गया था। परंतु बिना किसी न्यायिक विवेक के स्थिर मृत्युदंड अनिवार्य करना संविधान द्वारा सुनिश्चित निष्पक्ष और वैयक्तिकृत दंड निर्धारण की गारंटी से टकराता पाया गया। टिप्पणी: यहां निर्धारित अनिवार्य मृत्युदंड को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक ठहराकर रद्द कर दिया; उसके बाद से ऐसे मामलों में न्यायालय सामान्य हत्या के दंड-विधान (आजीवन कारावास या मृत्युदंड, न्यायिक विवेक के अनुसार) लागू करते हैं। भारतीय दंड संहिता के स्थान पर आई Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में, यह विशिष्ट अनिवार्य व्यवस्था अपने मूल रूप में नहीं रखी गई, क्योंकि इसे पहले ही असंवैधानिक ठहराया जा चुका था।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने इस धारा के अंतर्गत अनिवार्य मृत्युदंड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि ऐसा कानून जो दंड निर्धारण में समूचा न्यायिक विवेक हटा दे और एकमात्र, अनिवार्य सजा थोप दे, निष्पक्ष व वैयक्तिकृत दंड प्रक्रिया की गारंटी का उल्लंघन करता है; अतः न्यायालयों को प्रत्येक मामले के तथ्यों—जिसमें पहले की आजीवन सजा भी शामिल है—का मूल्यांकन करके बाद की हत्या पर आजीवन कारावास और मृत्युदंड में से उपयुक्त सजा चुननी चाहिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा अब भी ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जो पहले से आजीवन कारावास भुगत रहा हो और फिर एक और हत्या करे, स्वतः मृत्युदंड अनिवार्य करती है।
तथ्य: सर्वोच्च न्यायालय ने यहां अनिवार्य मृत्युदंड को असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया; अब न्यायाधीश प्रत्येक मामले के तथ्यों को देखकर आजीवन कारावास और मृत्युदंड में से उपयुक्त सजा चुनने का विवेक रखते हैं।