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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 191

repealed

Giving false evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा भारतीय दंड संहिता के उस अध्याय का हिस्सा है जो न्याय के प्रशासन को प्रभावित करने वाले अपराधों से संबंधित है। इसका उद्देश्य यह है कि न्यायालय, अधिकरण और आधिकारिक कार्यवाही तब ही टिकाऊ रहती हैं जब लोग शपथ लेकर या कानूनी रूप से बाध्य होने पर ईमानदारी से कथन करें। ‘झूठा सबूत’ की स्पष्ट परिभाषा के बिना, मिथ्याभियोग (perjury) या झूठी घोषणाओं पर भरोसेमंद अभियोजन कठिन हो जाता। ब्रिटिश उपनिवेशकालीन प्रारूपणकर्ताओं ने इसे अंग्रेज़ी सामान्य विधि के परंपरागत सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया और भारत भर में लागू करने हेतु संहिताबद्ध परिभाषा में ढाला।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारत के न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह धारा केवल ‘झूठा सबूत’ की अवधारणा को परिभाषित करती है — यह स्वयं दंड निर्धारित नहीं करती (वह भारतीय दंड संहिता की धारा 193 में है)। न्यायालयों ने माना है कि केवल असंगति या ईमानदार भूल पर्याप्त नहीं है; झूठ होने का ज्ञान, झूठ होने का विश्वास, या सत्य पर वास्तविक विश्वास का अभाव होना चाहिए। निर्णयों ने रेखांकित किया है कि अभियोजन को कथन की असत्यता के बारे में अभियुक्त की मानसिक अवस्था (मेंस रेया [mens rea]) सिद्ध करनी होती है, मात्र यह नहीं कि कथन बाद में गलत निकला।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 191 स्वयं अदालत में झूठ बोलने वालों को दंडित करती है।

    तथ्य: यह धारा केवल ‘झूठा सबूत’ का अर्थ परिभाषित करती है। ‘झूठा सबूत’ देने का वास्तविक दंड अलग से भारतीय दंड संहिता की धारा 193 में निर्धारित है।

  • मिथक: अदालत में कही गई कोई भी गलत बात इस क़ानून के तहत ‘झूठा सबूत’ है।

    तथ्य: व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि कथन झूठा है, या वह उसे झूठा मानता हो, या उसे उसके सत्य होने पर विश्वास न हो। ईमानदार भूल या कथन की सत्यता में वास्तविक विश्वास इस श्रेणी में नहीं आता।