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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 227

Giving false evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान, पुराने Indian Penal Code की धारा 191 से आगे बढ़ाया गया है, और न्यायिक व कानूनी कार्यवाहियों की निष्कलंकता की रक्षा के लिए बनाया गया है। न्यायालय, सरकारी निकाय और आधिकारिक प्रक्रियाएँ इस पर निर्भर करती हैं कि लोग शपथ, कानूनी दायित्व या घोषणा के तहत सत्य बोलें। यदि ‘झूठा साक्ष्य’ किसे कहते हैं इसकी स्पष्ट परिभाषा न हो, तो perjury (झूठी गवाही का अपराध) या कपटपूर्ण घोषणाओं को दंडित करना कठिन हो जाता। यह प्रावधान केवल वस्तुगत सत्य पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के अपने ज्ञान या विश्वास पर भी ध्यान देता है — यह मानते हुए कि ईमानदार गलती, जानबूझकर झूठ से भिन्न होती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, समान पूर्ववर्ती प्रावधान (Section 191, IPC) की व्याख्या करते हुए, लगातार यह माना है कि झूठे साक्ष्य का मूल तत्व वही है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर या लापरवाही से वह बात assert करता है जिसे वह ईमानदारी से सच नहीं मानता — मात्र त्रुटि या ईमानदार भ्रमित विश्वास झूठा साक्ष्य नहीं बनता। न्यायालयों ने बार‑बार ईमानदार भूल (उदाहरण (c) जैसे प्रसंग) और जानी‑बूझी असत्यता (उदाहरण (b), (d) जैसे प्रसंग) के बीच भेद किया है, और बल दिया है कि अभियोजन को कथन के समय अभियुक्त की वास्तविक मानसिक अवस्था सिद्ध करनी होती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अदालत में तथ्यात्मक रूप से गलत होना हमेशा झूठा साक्ष्य माना जाता है।

    तथ्य: कानून व्यक्ति के उस समय के ईमानदार विश्वास पर केंद्रित है। यदि किसी ने सच्चे मन से अपने कथन को सत्य माना, तो केवल तथ्यात्मक रूप से गलत होना झूठा साक्ष्य नहीं बनता (उदाहरण (c) देखें)।

  • मिथक: झूठा साक्ष्य केवल मौखिक अदालती गवाही पर ही लागू होता है।

    तथ्य: स्पष्टीकरण 1 साफ करता है कि कथन मौखिक या अन्य किसी रूप में हो सकता है, और यह धारा घोषणाओं, अनुवादों तथा अन्य विधि से बाध्यकारी बयानों पर भी लागू होती है।