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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 174A

repealed

Non-appearance in response to a proclamation under section 82 of Act 2 of 1974

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा 2005 में भारतीय दंड संहिता (IPC) में जोड़ी गई थी ताकि दंप्रसं की धारा 82 के तहत जारी उद्घोषणा प्रक्रिया को वास्तविक प्रभाव मिल सके। इससे पहले, न्यायालय द्वारा उद्घोषित किए जाने के बाद केवल उपस्थित न होने पर फरार व्यक्ति को सीधे आपराधिक दुष्परिणाम सीमित रूप से झेलने पड़ते थे — उद्घोषणा अधिकतर एक प्रक्रियात्मक कदम भर थी (जिसके बाद अक्सर दंप्रसं की धारा 83 के तहत संपत्ति कुर्की होती थी)। विधायकों ने विशेषकर गंभीर मामलों में, अभियुक्तों द्वारा जानबूझकर छिपकर मुकदमे से बचने को रोकने हेतु एक अलग दंडनीय अपराध निर्मित करना चाहा, ताकि फरार व्यक्तियों के कारण न्याय अनिश्चितकाल तक न अटका रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने स्पष्ट किया है कि केवल घर पर न मिलना या समन का तामील न होना पर्याप्त नहीं है — दंप्रसं की धारा 82 के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा-उपाय (जैसे न्यायालय का यह दर्ज करना कि उसे ‘विश्वास का कारण’ है कि व्यक्ति फरार है, और उद्घोषणा का विधिवत जारी/प्रकाशन) कड़ाई से पूरे होने चाहिए, तभी धारा 174A लगाई जा सकती है। कई उच्च न्यायालयों ने इस धारा के तहत कार्यवाही रद्द की है जहां मूल धारा 82 की उद्घोषणा ही प्रक्रियागत रूप से दोषपूर्ण थी, यह रेखांकित करते हुए कि यह दंडात्मक प्रावधान है, जिसमें पूर्ववर्ती प्रक्रिया का अक्षरश: पालन आवश्यक है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 174A किसी भी व्यक्ति पर लागू होती है जो बस अदालत की तारीख़ मिस कर दे।

    तथ्य: यह तभी लागू होती है जब दंप्रसं की धारा 82 के तहत औपचारिक उद्घोषणा विधिवत जारी और प्रकाशित की गई हो, यानी अदालत पहले ही यह कारण दर्ज कर चुकी हो कि व्यक्ति फरार है।

  • मिथक: ‘घोषित अपराधी’ घोषित किया जाना, केवल ‘घोषित व्यक्ति’ बनाए जाने के बाद अपने-आप हो जाता है।

    तथ्य: धारा 82(4) के तहत ‘घोषित अपराधी’ घोषित करना एक अलग, अधिक गंभीर कदम है जो आम तौर पर निर्दिष्ट जघन्य अपराधों तक सीमित रहता है, और यही इस धारा के तहत 7 वर्ष तक की अधिक उच्च सज़ा को सक्रिय करता है।