उच्चतम न्यायालय ने हाल ही के एक निर्णय में एक बर्खास्तगी आदेश की जांच की, जिसमें अनुशासनिक प्राधिकारी ने अनुच्छेद 311(2) के दूसरे परंतुक का सहारा लिया था — जो यह अनुमति देता है कि जब जांच कराना "युक्तियुक्त रूप से व्यवहार्य नहीं" हो तो बिना जांच के बर्खास्तगी की जा सकती है। न्यायालय ने कहा कि यह एक अपवाद है, न कि सामान्य विकल्प, और इसका उपयोग प्रशासनिक सुविधा के शॉर्टकट के रूप में नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 310 प्रसादपर्यंत सिद्धांत (doctrine of pleasure) को समाहित करता है, जिसके अंतर्गत सिविल सेवक राष्ट्रपति/राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। अनुच्छेद 311 इस प्रसादपर्यंत सिद्धांत को सीमित करता है और बर्खास्तगी, पदच्युति अथवा पद-अवनति से पहले उचित जांच की गारंटी देता है। अनुच्छेद 311(2) का परंतुक (ख) एक संकीर्ण अपवाद है जिसके लिए लिखित एवं अभिलिखित कारण आवश्यक हैं, जो वास्तविक अव्यवहार्यता को दर्शाते हों (उदाहरण के लिए, भयभीत गवाह, कानून-व्यवस्था का चरमरा जाना) — न कि मात्र प्रशासनिक सुविधा — और ऐसा समाधान न्यायिक पुनरीक्षण के अधीन है, जो अनुच्छेद 14 के मनमानी-रहितता के मानक को भी लागू करता है।

याद रखें: अनुच्छेद 310 (प्रसादपर्यंत सिद्धांत) बनाम अनुच्छेद 311 (सुरक्षा उपाय); 311(2) के तीन परंतुक — (क) आपराधिक दोषसिद्धि, (ख) अव्यवहार्यता, (ग) राज्य की सुरक्षा; और यह कि परंतुक (ख) अभिलिखित, वस्तुनिष्ठ रूप से परखने योग्य कारणों की मांग करता है, न कि रटे-रटाए औपचारिक कथनों की।