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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 88

Presumption as to certified copies of foreign judicial records

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय न्यायालयों को प्रायः अन्य देशों के न्यायिक अभिलेखों पर निर्भर करना पड़ता है—जैसे विदेशी विवाह, तलाक, संपत्ति या अपराध से जुड़े मामलों में। क्योंकि हर विदेशी दस्तावेज़ की स्वतंत्र जाँच कर पाना व्यावहारिक नहीं है, क़ानून यह अनुमति देता है कि जब प्रमाणन उस देश की सामान्य पद्धति के अनुसार हो और केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि द्वारा इसकी पुष्टि हो जाए, तो न्यायालय उसके प्रामाणिक होने का अनुमान लगा सके। इससे समय बचता है और विदेश से आए दस्तावेज़ों के लिए असंभव प्रमाण-मानकों की मांग से बचाव होता है। यह पहले के Indian Evidence Act, 1872 के समान प्रावधान को आगे बढ़ाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी विदेशी दस्तावेज़ की प्रति अपने-आप सत्य मान ली जाती है।

    तथ्य: न्यायालय केवल ‘मान लेने’ का विवेकाधिकार रखता है, और वह भी तभी जब प्रमाणन-पद्धति को केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि द्वारा उस देश की मानक प्रथा के रूप में पुष्टि किया गया हो—यह न तो स्वचालित है और न ही अनिवार्य।

  • मिथक: यह धारा निर्णय की विषय-वस्तु को सही सिद्ध कर देती है।

    तथ्य: यह केवल इतना मानने का अनुमान देती है कि प्रति वास्तविक है और उसका प्रमाणन सही ढंग से हुआ है; यह नहीं मानती कि मूल निर्णय के कानूनी निष्कर्ष सही हैं या भारत में बाध्यकारी हैं।