Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 87
Presumption as to Electronic Signature Certificates
The Court shall presume, unless contrary is proved, that the information listed in an Electronic Signature Certificate is correct, except for information specified as subscriber information which has not been verified, if the certificate was accepted by the subscriber.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
जैसे-जैसे डिजिटल हस्ताक्षर और इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन सामान्य हुए, कानून को इस बात की आवश्यकता हुई कि इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणपत्रों को न्यायालय में उतना ही विश्वसनीय माना जाए जितना हस्ताक्षरित कागज या मुहरों वाले भौतिक दस्तावेजों को। यह प्रावधान, जो पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम की रूपरेखा से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के साक्ष्य संबंधी प्रावधानों के माध्यम से आगे आया था और अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) में रखा गया है, न्यायालयों को हर बार प्रमाणपत्र के प्रत्येक तकनीकी विवरण की फिर से जाँच करने के झंझट से बचाता है, जबकि बिना जाँची गई दावेदारियों से बचाव भी करता है—क्योंकि सब्सक्राइबर की अप्रमाणित जानकारी पर यह भरोसा स्वतः नहीं फैलाया जाता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: एक बार आपने इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्र स्वीकार कर लिया, तो उसमें लिखा सब कुछ हर हाल में स्वतः 100% कानूनी रूप से सत्य माना जाएगा—यह कथन गलत है।
तथ्य: इस धारणा को साक्ष्य से चुनौती देकर खारिज किया जा सकता है; साथ ही, सब्सक्राइबर की अप्रमाणित जानकारी इस स्वतः-विश्वास के दायरे से बाहर रहती है।
मिथक: यह प्रावधान हर प्रकार के डिजिटल दस्तावेज़ पर लागू होता है—यह कथन सही नहीं है।
तथ्य: यह विशेष रूप से उन इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर प्रमाणपत्रों पर लागू होता है जिन्हें सब्सक्राइबर ने स्वीकार किया है; यह सभी इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों पर सामान्य रूप से लागू नहीं होता।