Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 61
Electronic or digital record
Nothing in this Adhiniyam shall apply to deny the admissibility of an electronic or digital record in the evidence on the ground that it is an electronic or digital record and such record shall, subject to section 63, have the same legal effect, validity and enforceability as other document.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
जैसे-जैसे जीवन ऑनलाइन हुआ, न्यायालयों को ईमेल, व्हाट्सऐप संदेश, सीसीटीवी फुटेज, कम्प्यूटर प्रिन्टआउट और अन्य डिजिटल सामग्री को साक्ष्य के रूप में अधिकाधिक संभालना पड़ा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (विशेषकर धारा 65B) के अंतर्गत पहले के प्रावधानों से यह भ्रम बना रहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य कब ग्राह्य होगा, जिससे वर्षों तक परस्पर-विरोधी निर्णय हुए। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) इस सिद्धान्त को स्पष्ट रूप से दोहराता है: इलेक्ट्रॉनिक अभिलेख किसी भी कागज़ी दस्तावेज़ की तरह वैध साक्ष्य हैं, परन्तु छेड़छाड़ या मनगढ़न्ती से बचाने हेतु उनकी विश्वसनीयता का धारा 63 के अनुसार प्रमाणीकरण आवश्यक है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
यह प्रावधान Anvar P.V. v. P.K. Basheer (2014) और बाद के Arjun Panditrao Khotkar v. Kailash Kushanrao Gorantyal (2020) में दिए गए तर्क का अनुगमन करता है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य तभी ग्राह्य है जब उपयुक्त प्रमाणपत्र संलग्न हो (पूर्व में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के अंतर्गत)। इन निर्णयों ने स्पष्ट किया कि डिजिटल साक्ष्य पूर्णतः वैध है, पर उसकी प्रामाणिकता प्रमाणन-प्रक्रिया से सत्यापित होनी चाहिए—यह सिद्धान्त अब नये अधिनियम की धारा 63 के माध्यम से आगे बढ़ाया गया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: ऐसा कहना गलत है कि स्क्रीनशॉट या ईमेल जैसे डिजिटल साक्ष्य पर भारतीय न्यायालय कभी भरोसा नहीं कर सकते।
तथ्य: उन पर भरोसा किया जा सकता है और उन्हें साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है, बशर्ते धारा 63 के अंतर्गत प्रमाणन की शर्त पूरी की गई हो।
मिथक: यह धारा सभी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को बिना किसी शर्त के स्वतः ग्राह्य बना देती है—ऐसा कहना गलत है।
तथ्य: ग्राह्यता धारा 63 के अनुपालन पर निर्भर है, जो प्रामाणिकता हेतु समुचित प्रमाणन की माँग करती है।