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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 148

Cross-examination as to previous statements in writing

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में विकसित अंग्रेज़ी कॉमन लॉ के एक दीर्घकालीन सिद्धांत (विशेषकर ‘Queen’s Case’, 1820) से आया, जिसने दो आवश्यकताओं में संतुलन साधा: वकीलों को गवाह की विश्वसनीयता को उसके पूर्व कथनों का हवाला देकर परखने देना, और साथ ही गवाह के प्रति न्यायसंगत रहना—अर्थात किसी भी प्रकट असंगति का औपचारिक उपयोग करने से पहले उसे समझाने का अवसर देना। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 ने इसे धारा 145 के रूप में अपनाया, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam), 2023 ने इसे सारतः बिना परिवर्तन धारा 148 के रूप में पुनः अधिनियमित किया, जिससे प्रभावी जिरह और प्रक्रिया-संगत न्याय के इस संतुलन को जारी रखा गया।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लम्बे समय से सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय Tahsildar Singh v. State of U.P. (1959) पर भरोसा करते आए हैं, जिसमें पूर्ववर्ती धारा 145 (साक्ष्य अधिनियम) का परीक्षण किया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गवाह की अदालती गवाही और उसके पूर्व कथन (जैसे पुलिस को दिया गया बयान) के बीच ‘वास्तविक विरोधाभास’ क्या माना जाएगा, और छोड़े गए तथ्यों (उल्लेख-न-होना) तथा सच्ची असंगतियों में भेद किया; साथ ही यह पुष्टि की कि गवाह को विशेष अंश दिखाकर उन्हें समझाने का उचित अवसर देना अनिवार्य है, तभी उसे उसकी विश्वसनीयता घटाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह निर्णय आज भी धारा के दूसरे भाग में निहित ‘ध्यान आकर्षित करने’ की शर्त के अनुप्रयोग का मार्गदर्शक अधिकार बना हुआ है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि वकील को हमेशा किसी भी सवाल से पहले गवाह को उसका पूर्व लिखित बयान दिखाना ही पड़ेगा।

    तथ्य: क़ानून स्पष्ट रूप से यह अनुमति देता है कि पूर्व कथन पर जिरह बिना उसे पहले दिखाए की जा सकती है; संबंधित अंश दिखाने की आवश्यकता केवल तब लागू होती है जब वकील उस लिखित कथन को गवाह के प्रतिकूल औपचारिक रूप से सिद्ध करना चाहता है।

  • मिथक: यह कहना गलत है कि कोई भी पुराना कथन अपने-आप इस धारा के तहत ‘विरोधाभास’ मान लिया जाएगा।

    तथ्य: अदालतों ने, विशेषकर Tahsildar Singh v. State of U.P. में, स्पष्ट किया है कि मात्र चूकें या जोर-देने में फर्क हमेशा सच्चे विरोधाभास नहीं होते—इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए बयान सच में अदालत की गवाही से टकराना चाहिए।