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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 133

Privilege not waived by volunteering evidence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 132) के एक लंबे समय से चले आ रहे नियम को आगे बढ़ाता है, जो विधिक व्यावसायिक विशेषाधिकार (legal professional privilege) के व्यापक सिद्धांत पर आधारित है। वकीलों को चाहिए कि मुवक्किल निडर होकर, ईमानदारी से बात करें—इस भय के बिना कि गोपनीय रूप से कही गई बातें बाद में जबरन उजागर कर दी जाएंगी। न्यायालयों और विधि‑निर्माताओं की चिंता थी कि यदि मात्र गवाह‑पेटी में कदम रखने से यह सुरक्षा समाप्त मानी जाए, तो मुवक्किल या तो गवाही देने से कतरा सकते हैं या अपने ही वकीलों से सच छिपा सकते हैं। यह धारा यह स्पष्ट कर उस जोखिम को दूर करती है कि अपने मामले के तथ्यों पर गवाही देना आपकी निजी कानूनी चर्चाओं का द्वार खोल देने के समान नहीं है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 132) के तहत भारतीय न्यायालयों ने लगातार माना है कि मुवक्किल का साक्ष्य देना मात्र अपने आप में उसके अपने अधिवक्ता के साथ संचार पर विद्यमान विशेषाधिकार छोड़ देने के समान नहीं होता। न्यायालयों ने विवाद के आधारभूत तथ्यों पर गवाही देने और गोपनीय कानूनी सलाह का खुलासा करने में भेद किया है; बाद वाला तभी संभव है जब कोई स्पष्ट, जानबूझकर किया गया परित्याग हो—जैसे संरक्षित विषयों पर अपने ही अधिवक्ता से सीधा प्रश्न करना।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि आप अपने ही मामले में गवाही देते हैं, तो आप स्वतः ही अपने वकील के साथ हुई बातचीत को निजी रखने का अधिकार खो देते हैं।

    तथ्य: अपने मामले के तथ्यों पर गवाही देना मात्र अपने आप में आपके वकील के साथ गोपनीय संचार पर विद्यमान विशेषाधिकार को समाप्त (छूट) नहीं करता।