Skip to content
सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 131

Information as to commission of offences

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 125 से आया है, जिसे लगभग ज्यों‑का‑त्यों Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में आगे बढ़ाया गया है। औपनिवेशिक काल के विधि‑निर्माताओं ने समझा था कि यदि अधिकारियों से यह पूछताछ की जा सके कि उन्हें अपराध के बारे में सूचना या संकेत ठीक किस समय मिला, तो मुखबिरों का भंडाफोड़ हो सकता है, चल रही जांचें प्रभावित हो सकती हैं, या चालाक बचाव पक्ष समयांतराल का सहारा लेकर मामले के सार की बजाय उसकी विश्वसनीयता पर चोट कर सकता है। यह नियम अनिवार्य खुलासे से इसी विशेष विवरण (समय) को बचाकर जांच की निष्पक्षता और स्रोतों की सुरक्षा करता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, साक्ष्य अधिनियम की समान पूर्ववर्ती धारा 125 की व्याख्या करते हुए, सामान्यतः माना है कि यह सुरक्षा संकीर्ण है—यह केवल इस बात के समय को ढांकती है कि सूचना कब प्राप्त हुई; अन्य संदर्भों में सूचना स्वयं या उसके स्रोत को नहीं। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि यह गवाही से समग्र छूट नहीं है; अधिकारियों से मामले के तथ्यों पर जिरह हो सकती है, और यह विशेषाधिकार पूरी जांच फाइल छिपाने तक विस्तृत नहीं है, केवल इस विशिष्ट प्रश्न तक सीमित है कि उन्हें अपराध का पता ‘कब’ चला।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह प्रावधान पुलिस अधिकारियों को किसी अपराध के बारे में पूरी तरह गवाही देने से इंकार करने की अनुमति देता है।

    तथ्य: यह केवल उन्हें इस बात का सटीक समय न बताने की सुरक्षा देता है कि उन्हें सूचना कब मिली—मामले के तथ्यों और घटनाओं पर उन्हें फिर भी गवाही देनी होगी।

  • मिथक: यह नियम अधिकारियों को मुखबिरों की पहचान पूरी तरह छिपाने देता है।

    तथ्य: यह धारा केवल सूचना के समय से संबंधित है, न कि स्रोत से; मुखबिर संरक्षण से जुड़े अन्य कानूनी प्रावधान और सिद्धांत अलग से लागू होते हैं।