Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 129
Evidence as to affairs of State
No one shall be permitted to give any evidence derived from unpublished official records relating to any affairs of State, except with the permission of the officer at the head of the department concerned, who shall give or withhold such permission as he thinks fit.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम ब्रिटिश काल के भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Section 123) से आया है और लगभग यथावत भारतीय साक्ष्य अधिनियम के स्थान पर बने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 में Section 129 के रूप में जारी रहा। इसका आधार यह विचार है कि कुछ सरकारी अभिलेख—जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, या आंतरिक विचार-विमर्श से जुड़े दस्तावेज—जनहित में गोपनीय रखे जाने चाहिए। कानून दो प्रतिस्पर्धी हितों के बीच संतुलन साधता है: निष्पक्ष मुकदमे के लिए साक्ष्य की आवश्यकता, और वाद-विवाद के जरिए संवेदनशील जानकारी के सार्वजनिक हो जाने से राज्य के हितों की रक्षा।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
शुरुआत में, State of Punjab v. Sodhi Sukhdev Singh (1961) में सर्वोच्च न्यायालय ने विभागाध्यक्ष के दस्तावेज़ रोकने के फ़ैसले को लगभग अंतिम माना और कार्यपालिका को व्यापक विवेक दिया। यह रुख State of U.P. v. Raj Narain (1975) में काफ़ी बदला, जहाँ न्यायालय ने कहा कि इस प्रावधान के तहत लिया गया विशेषाधिकार (privilege) अंतिम नहीं है—अदालत दस्तावेज़ों को निजी तौर पर (इन कैमरा) देखकर तय कर सकती है कि गोपनीयता का जनहित, न्याय के लिए खुलासे के जनहित से सच में भारी है या नहीं। S.P. Gupta v. Union of India (1982) ने इस दृष्टिकोण की पुष्टि की और कहा कि दस्तावेज़ों की पूरी श्रेणियों पर समग्र विशेषाधिकार के दावे स्वीकार्य नहीं हैं और अदालतों के पास अनुचित अस्वीकार को परखने और आवश्यकता होने पर पलटने की शक्ति है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: इस धारा के तहत दस्तावेज़ रोकने का अधिकारी का फ़ैसला पूर्णतः अंतिम है और कभी चुनौती नहीं दी जा सकती।
तथ्य: अदालतों ने, विशेषतः State of U.P. v. Raj Narain (1975) में, माना है कि न्यायाधीश ऐसे दावों की समीक्षा कर सकते हैं और यहाँ तक कि दस्तावेज़ों का निजी निरीक्षण भी कर सकते हैं ताकि सुनिश्चित हो कि इनकार वास्तव में जायज़ है और कदाचार छिपाने के लिए दुरुपयोग नहीं।
मिथक: यह प्रावधान सरकार को सिर्फ़ ‘राज्य का मामला’ कहकर किसी भी दस्तावेज़ को छिपाने की खुली छूट देता है।
तथ्य: अदालतें मांग करती हैं कि दावा वास्तविक राज्य-हित (जैसे सुरक्षा या कूटनीति) से संबंधित हो, और दस्तावेज़ों की पूरी-की-पूरी श्रेणियों पर समग्र या अस्पष्ट दावों को सर्वोच्च न्यायालय ने अस्वीकार किया है।