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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 127

Judges and Magistrates

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करता है। यदि न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों को बार‑बार अन्य कार्यवाहियों में घसीट कर उनके न्यायालयीन निर्णयों और तर्क का स्पष्टीकरण या बचाव कराने को मजबूर किया जाए, तो यह न्यायिक प्राधिकार को कमजोर करेगा, वाद-विवाद के माध्यम से उत्पीड़न को आमंत्रित करेगा, और निर्भीक व निष्कपट निर्णय‑निर्माण को हतोत्साहित करेगा। साथ ही, कानून न्यायाधीशों को पूर्ण दायित्त्व-मुक्ति नहीं देता—यदि उनकी उपस्थिति में कोई ऐसी प्रासंगिक घटना घटी हो जो उनके न्यायिक दायित्व या तर्क से संबंधित न हो (जैसे किसी अपराध का प्रत्यक्ष साक्ष्य), तो उनसे किसी सामान्य गवाह की तरह पूछताछ की जा सकती है। यह प्रावधान Indian Evidence Act, 1872 की Section 121 को Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में बिना किसी सारभूत परिवर्तन के आगे बढ़ाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने इतिहासतः इस प्रावधान की व्याख्या संकीर्ण रूप में की है ताकि न्यायिक आचरण और तर्क की रक्षा हो, पर इसे न्यायाधीश के असंबंधित तथ्यों के निजी ज्ञान से अलग माना है। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह विशेषाधिकार व्यक्ति का नहीं, न्यायिक कार्य का है; इसलिए, जैसा कि तीसरी दृष्टांत में दिखाया गया है, न्यायाधीश को उन बातों पर गवाह के रूप में परखा जा सकता है जिन्हें उन्होंने अपने आधिकारिक न्यायिक कृत्यों से बाहर प्रत्यक्ष देखा हो। ‘उच्चतर न्यायालय के विशेष आदेश’ की शर्त को वास्तविक सुरक्षा-कवच माना गया है, औपचारिकता नहीं, ताकि निचली अदालतें या निजी वादी न्यायाधीशों को सरलता से अपने निर्णयों का औचित्य बताने को तलब न कर सकें।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों से उस मुकदमे के दौरान घटी किसी भी बात पर कभी भी प्रश्न नहीं पूछे जा सकते जिसमें वे अध्यक्ष थे।

    तथ्य: वे उन घटनाओं के बारे में पूछे जा सकते हैं जिन्हें उन्होंने देखा हो और जो उनकी न्यायिक तर्क‑प्रक्रिया या आचरण से असंबद्ध हों, जैसे अदालत कक्ष में घटी कोई घटना।

  • मिथक: यह प्रावधान न्यायाधीशों को कभी भी जिरह से गुजरने से पूर्ण कानूनी प्रतिरक्षा देता है।

    तथ्य: यदि परिस्थितियाँ आवश्यक बनाएँ, तो एक उच्चतर न्यायालय विशेष आदेश देकर किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को अदालत में उनके अपने आचरण के बारे में प्रश्नों के उत्तर देने को कह सकता है।