Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 126
Competency of husband and wife as witnesses in certain cases
(1) In all civil proceedings the parties to the suit, and the husband or wife of any party to the suit, shall be competent witnesses.
(2) In criminal proceedings against any person, the husband or wife of such person, respectively, shall be a competent witness.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
इतिहासतः, पुराने अंग्रेज़ी कॉमन‑लॉ परंपराओं में पति‑पत्नी को प्रायः एक कानूनी व्यक्ति माना जाता था, इसलिए एक जीवनसाथी दूसरे के पक्ष में या विरोध में गवाही नहीं दे सकता था — आशंका थी कि पक्षपात या दबाव होगा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 120, जिसे अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 126 के रूप में पुनरुत्पादित किया गया है) ने इस कठोर नियम को अस्वीकार किया और पति‑पत्नी को कानूनी रूप से ‘समर्थ’ गवाह घोषित किया, अर्थात अदालतें केवल वैवाहिक संबंध के कारण उनकी गवाही सुनने से इन्कार नहीं कर सकतीं। इस सुधार ने यह माना कि कई बार प्रासंगिक तथ्यों का सबसे प्रत्यक्ष ज्ञान जीवनसाथी के पास ही होता है, खासकर घरेलू या परिवार-संबंधी विवादों और अपराधों में।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतें लगातार ‘समर्थता’ (कौन गवाही दे सकता है) को ‘बाध्यत्व’ और ‘विशेषाधिकार’ से अलग मानती रही हैं (कौन-सी गोपनीय वैवाहिक संवाद संरक्षित हैं — यह अलग से 2023 अधिनियम की धारा 128, पूर्व 1872 अधिनियम की धारा 122 में विन्यस्त है)। न्यायिक निर्णयों ने स्पष्ट किया है कि जीवनसाथी गवाही दे सकता/सकती है, परंतु गोपनीय वैवाहिक संवाद तब तक सुरक्षित रहते हैं जब तक दोनों पक्ष सहमति न दें या कोई अपवाद न लागू हो (जैसे एक जीवनसाथी पर दूसरे के विरुद्ध अपराध का मुकदमा चलना)। इस प्रावधान के आधार पर अदालतों ने घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और वैवाहिक विवादों में पति‑पत्नी की गवाही स्वीकार की है, जबकि गोपनीय संवाद पर अलग नियम का सम्मान बरकरार रखा है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: गलत: पति या पत्नी कभी भी अपने जीवनसाथी के विरुद्ध अदालत में गवाही नहीं दे सकते।
तथ्य: यह धारा पति‑पत्नी को समर्थ गवाह बनाती है; किन गोपनीय संवादों का खुलासा किया जा सकता है, यह अलग नियम (विशेषाधिकार) का विषय है, जो यहाँ शामिल नहीं है।
मिथक: गलत: यह धारा जीवनसाथी को अपने साथी के विरुद्ध जबरन गवाही देने पर मजबूर करती है।
तथ्य: यह प्रावधान उन्हें केवल ‘समर्थ’ (अनुमोदित) गवाह बनाता है; उन्हें गवाही देने के लिए बाध्य किया जा सकता है या नहीं, यह अन्य प्रक्रियात्मक नियमों और अपवादों पर निर्भर कर सकता है।