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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 82

Procedure on arrest of person against whom warrant issued

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम औपनिवेशिक काल के दंड प्रक्रिया संहिता से आया है, जिसका उद्देश्य गिरफ़्तार व्यक्ति को वारंट जारी करने वाले न्यायालय तक लंबी दूरी तक घसीटने जैसी कठोर प्रथा को रोकना था। नज़दीकी मजिस्ट्रेट या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के समक्ष पेशी की शर्त से गिरफ़्तारी के स्थान के पास ही त्वरित न्यायिक/प्रशासनिक निगरानी सुनिश्चित होती है, जबकि सूचनादेही की अनिवार्यता से अलग-अलग ज़िलों की पुलिस अभिलेख आपस में जुड़े रहते हैं ताकि व्यक्ति तंत्र में गुम न हो जाए या उसे बिना संपर्क के न रखा जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: गिरफ़्तार व्यक्ति को हमेशा सीधे उसी अदालत में ले जाना होता है जिसने वारंट जारी किया था, चाहे वह कितनी भी दूर हो।

    तथ्य: क़ानून जानबूझकर इससे बचता है—जब तक वारंट जारी करने वाली अदालत बहुत क़रीब (30 किमी के भीतर) न हो या स्थानीय मजिस्ट्रेट/पुलिस प्रमुख से भी निकट न हो, तब व्यक्ति को पहले स्थानीय प्राधिकारियों के समक्ष ही पेश किया जाता है।

  • मिथक: पुलिस पर यह बताने की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है कि गिरफ़्तार व्यक्ति को कहाँ रखा गया है।

    तथ्य: उप-धारा (2) पुलिस को यह अनिवार्य करती है कि वे गिरफ़्तारी और हिरासत-स्थान के बारे में तुरंत स्थानीय नामित अधिकारी को तथा उस व्यक्ति के गृह ज़िले की पुलिस को भी सूचित करें।