Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 72
Form of warrant of arrest and duration
(1) Every warrant of arrest issued by a Court under this Sanhita shall be in writing, signed by the presiding officer of such Court and shall bear the seal of the Court.
(2) Every such warrant shall remain in force until it is cancelled by the Court which issued it, or until it is executed.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध एक लंबे समय से चले आ रहे नियम (पूर्व में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 70) को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य मनमानी या अनौपचारिक गिरफ़्तारियों को रोकना है। लिखित, हस्ताक्षरित और मुहरबंद दस्तावेज़ की अनिवार्यता से कानून यह सुनिश्चित करता है कि गिरफ़्तारी के लिए वास्तव में न्यायालय से अनुमति मिली है और दायित्व अध्यक्ष पदाधिकारी पर निश्चित होता है। वारंट को निष्पादन या रद्द होने तक वैध रखना (स्वतः समाप्ति-तिथि देने के बजाय) यह सुनिश्चित करता है कि जो व्यक्ति गिरफ़्तारी से बचता फिर रहा हो, वह केवल समय-सीमा बीत जाने से न्याय से न बच निकले।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालयों ने परंपरागत रूप से औपचारिक आवश्यकताओं — लेखन, हस्ताक्षर और मुहर — को आवश्यक सुरक्षा-उपाय माना है, और माना है कि इनमें कमी वाला वारंट अवैध बताकर चुनौती दिया जा सकता है। अवधि के प्रश्न पर, न्यायालय लगातार स्पष्ट करते रहे हैं कि गिरफ़्तारी वारंट, तलाशी वारंट या अन्य कई आदेशों के विपरीत, समय के साथ निष्प्रभावी नहीं होता; जब तक जारी करने वाला न्यायालय उसे वापस न ले, वह अनिश्चितकाल तक क्रियान्वित किया जा सकता है — इसी कारण पुलिस वर्षो पहले जारी वारंट को भी, यदि मामला लंबित है, लागू कर सकती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि यदि गिरफ़्तारी वारंट तय दिनों या महीनों में तामील न हो तो वह स्वतः अवैध हो जाता है।
तथ्य: इस धारा के तहत, वारंट तब तक प्रभावी रहता है जब तक जारी करने वाला न्यायालय उसे रद्द न कर दे या वह तामील न हो जाए — इसकी कोई स्वतः समाप्ति-तिथि नहीं है।
मिथक: यह कहना गलत है कि किसी को गिरफ़्तार करने के लिए न्यायाधीश का मौखिक आदेश ही पर्याप्त है।
तथ्य: कानून मांग करता है कि वारंट लिखित हो, अध्यक्ष पदाधिकारी के हस्ताक्षर से युक्त हो और न्यायालय की मुहर लगी हो; केवल मौखिक निर्देश इस शर्त को पूरा नहीं करते।