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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 190

Cases to be sent to Magistrate, when evidence is sufficient

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 170 से आगे बढ़ाया गया) सुनिश्चित करता है कि जब पुलिस जांच में पर्याप्त साक्ष्य एकत्र हो जाएँ, तो प्रकरण पुलिस के पास अटका न रहकर वास्तव में न्यायालय तक पहुँचे। यह न्यायिक प्राधिकार के समक्ष अभियुक्त को प्रस्तुत करने की आवश्यकता और अनावश्यक निरुद्धि से संरक्षण के बीच संतुलन बनाता है — जमानती अपराधों में जमानत-जैसी सुरक्षा की अनुमति देकर तथा यह स्पष्ट करके कि हिरासत में न होना एक वैध पुलिस रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार करने से नहीं रोक सकता।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने लंबे समय से स्पष्ट किया है कि पुराना समकक्ष प्रावधान (CrPC धारा 170) यह नहीं कहता कि अभियुक्त को हमेशा हथकड़ी लगाकर या शारीरिक हिरासत में ही पेश किया जाए — ‘हिरासत में भेजना’ को लचीले रूप में समझा गया है, जिसमें विधिसम्मत प्रक्रिया के माध्यम से अभियुक्त का प्रस्तुत किया जाना शामिल है। अदालतों ने यह भी रेखांकित किया है कि अभियुक्त की गिरफ्तारी न होने पर भी रिपोर्ट स्वीकार करने का मजिस्ट्रेट का दायित्व अनिवार्य है, जिससे पुलिस की निष्क्रियता या मजिस्ट्रेट के इंकार के कारण अभियोजन ठप न पड़े।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि इस धारा के अंतर्गत अभियुक्त को हमेशा हथकड़ी लगाकर और शारीरिक रूप से ही अदालत ले जाना अनिवार्य है।

    तथ्य: अदालतों ने ‘अभियुक्त को हिरासत में अग्रेषित करना’ वाक्यांश का लचीला अर्थ अपनाया है — इसका मतलब विधिसम्मत प्रक्रिया के जरिए प्रस्तुत करना है, न कि अनिवार्य रूप से शारीरिक बंधन; खासकर जमानती अपराधों में जहाँ बंधपत्र पर्याप्त होता है।

  • मिथक: यदि अभियुक्त कभी गिरफ्तार ही नहीं हुआ, तो मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट स्वीकार करने से इंकार कर सकता है — यह कथन गलत है।

    तथ्य: उपधारा (1) में संलग्न उपबंध स्पष्ट रूप से कहता है कि केवल इस आधार पर कि अभियुक्त को हिरासत में नहीं लिया गया था, मजिस्ट्रेट रिपोर्ट अस्वीकार नहीं कर सकता।