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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 191

Complainant and witnesses not to be required to accompany police officer and not to be

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान साधारण नागरिकों—परिवादियों और गवाहों—को संदिग्ध या अभियुक्त जैसा व्यवहार झेलने से बचाता है। इतिहास में कभी-कभी पुलिस ने गवाहों को जबरन अपने साथ चलने पर विवश कर के उनका उत्पीड़न किया, गरिमा को ठेस पहुँचाई और अनावश्यक असुविधा दी। कानून मानता है कि गवाह न्याय-प्रणाली की स्वेच्छा से मदद करते हैं, इसलिए उनसे महँगी जमानतें या बंधन नहीं, केवल सरल निजी बॉन्ड लिया जाना चाहिए। साथ ही यह राज्य के लिए एक सुरक्षा-उपाय भी रखता है: यदि कोई विधिसम्मत प्रक्रिया के बावजूद सच में सहयोग से इंकार करे, तो मात्र पुलिस नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट ही अभिरक्षा के माध्यम से उपस्थिति सुनिश्चित कर सकता/सकती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: गवाहों को अभियुक्तों की तरह मानकर पुलिस पहरे में ले जाकर यात्रा करवाई जा सकती है।

    तथ्य: कानून विशेष रूप से मना करता है कि गवाहों या परिवादियों से पुलिस अधिकारियों के साथ चलने को कहा जाए या उन्हें अनावश्यक बंधनों में रखा जाए।

  • मिथक: गवाहों को अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए पैसे जमा करने या किसी ज़मानतदार (श्योरिटी) देने की बाध्यता है।

    तथ्य: केवल उनकी अपनी निजी जमानत—लिखित वादा (बॉन्ड)—की आवश्यकता होती है, न कि दूसरों से आर्थिक ज़मानत की।

  • मिथक: पुलिस के पास अपने स्तर पर असहयोगी गवाहों को अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखने की असीमित शक्ति है।

    तथ्य: पुलिस केवल ऐसे इंकार करने वाले गवाह को मजिस्ट्रेट के पास भेज सकती है, और अभिरक्षा में रखना है या नहीं—यह निर्णय केवल मजिस्ट्रेट ही लेते/लेती हैं।