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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 163

Power to issue order in urgent cases of nuisance or apprehended danger

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144, अब दंड संहिता प्रक्रिया संहिता-परिवर्तित में धारा 163) स्थानीय प्राधिकारियों को तात्कालिक जन-जोखिम—जैसे दंगे, स्वास्थ्य-हानियाँ, या हिंसक टकराव—को बिना लंबी अदालती कार्यवाही की प्रतीक्षा किए तुरंत टालने का तेज़ साधन देता है। यह औपनिवेशिक दौर की पुलिसिंग आवश्यकताओं से उपजा था, पर बना रहा क्योंकि अचानक उत्पन्न संकट (महामारियाँ, सांप्रदायिक तनाव, प्राकृतिक आपदाएँ) प्रायः धीमी न्यायिक प्रक्रिया के बजाय तत्काल प्रशासनिक कार्रवाई मांगते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

उच्चतम न्यायालय ने इसके पूर्ववर्ती प्रावधान की संवैधानिक वैधता Madhu Limaye v. Sub-Divisional Magistrate, Monghyr (1970) में कायम रखी, यह कहते हुए कि यदि इसे वास्तविक, आसन्न ख़तरे को रोकने के लिए उपयोग किया जाए तो यह वाक्-स्वातंत्र्य और सभा-स्वातंत्र्य पर अनुचित प्रतिबंध नहीं है। Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) में, जम्मू और कश्मीर में इंटरनेट निलंबन के संदर्भ में, न्यायालय ने कहा कि ऐसे प्रावधानों के तहत दिए गए आदेश आनुपातिक, अस्थायी, सार्वजनिक रूप से प्रकाशित, और समय-समय पर पुनरावलोकित होने चाहिए — इस प्रकार यह पुष्ट किया कि इन शक्तियों का अनिश्चितकाल या मनमाने ढंग से उपयोग नहीं किया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह प्रावधान (पूर्व में धारा 144 दं.प्र.सं.) हर जगह, हर समय सभी प्रकार के जमावड़ों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है।

    तथ्य: यह केवल वहाँ लागू होता है जहाँ किसी मजिस्ट्रेट के पास तात्कालिक ख़तरे पर विश्वास करने के ठोस आधार हों, और इसे समय, स्थान और परिमाण में सीमित होना चाहिए; यह देशव्यापी समग्र प्रतिबंध नहीं हो सकता।

  • मिथक: एक बार ऐसा आदेश जारी हो गया तो उसे कभी चुनौती या परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

    तथ्य: उप-अनुच्छेद (5), (6) और (7) स्पष्ट रूप से किसी भी प्रभावित व्यक्ति को आदेश को निरस्त या संशोधित कराने हेतु आवेदन का अधिकार देते हैं, और निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी करते हैं।

  • मिथक: यदि आवश्यक समझें तो प्राधिकारी इस आदेश को अनिश्चितकाल तक जारी रख सकते हैं।

    तथ्य: क़ानून इसे अधिकतम दो माह तक सीमित करता है, जिसे राज्य सरकार अधिकतम छह माह और बढ़ा सकती है — इसे हमेशा के लिए जारी नहीं रखा जा सकता।