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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 153

Service or notification of order

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान एक दीर्घकालिक प्रक्रिया-सुरक्षा को आगे बढ़ाता है (जो पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 134 में मिलती थी) ताकि यह सुनिश्चित हो कि जिन लोगों पर रोकथाम अथवा लोक-व्यवस्था संबंधी प्रावधानों जैसे आदेश प्रभाव डालते हैं, उन्हें प्रभाव में आने से पहले समुचित सूचना मिल जाए। कानून मानता है कि सीधी तामील सबसे न्यायसंगत विधि है, परन्तु यदि व्यक्ति नहीं मिल रहा हो तो न्याय केवल टल न जाए—इसके लिए वैकल्पिक रूप में सार्वजनिक सूचना की अनुमति देता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने परंपरागत रूप से इस बात पर जोर दिया है कि ऐसे आदेशों की समुचित तामील केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय का प्रश्न है—प्रभावित व्यक्ति को अनुपालन की अपेक्षा से पहले वास्तविक सूचना मिलनी चाहिए। पुराने दंप्रसं धारा 134 के अंतर्गत न्यायालयों ने माना कि व्यक्तिगत तामील का प्रयास किए बिना सीधे उद्घोषणा पर जाने से प्रक्रिया विधिक रूप से कमजोर हो सकती है, क्योंकि उचित प्रक्रिया की माँग है कि प्रत्यक्ष संचार के यथोचित प्रयास पहले समाप्त किए जाएँ।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि व्यक्ति को वह आदेश कभी व्यक्तिगत रूप से मिला ही नहीं, तो आदेश अमान्य है।

    तथ्य: कानून यह अनुमति देता है कि जब व्यक्तिगत सुपुर्दगी व्यावहारिक न हो, तब सार्वजनिक उद्घोषणा और चिपकाने के माध्यम को वैध विकल्प माना जाए, और ऐसी सूचना से भी आदेश विधिक रूप से प्रभावी हो सकता है।

  • मिथक: सरकार सार्वजनिक सूचना का कोई भी तरीका चुन सकती है।

    तथ्य: उद्घोषणा की विधि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि ऐसे नोटिस देने में कुछ समानता और जवाबदेही सुनिश्चित रहे।