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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 158

Power of Magistrate to direct local investigation and examination of an expert

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आरोपी को समन करके मुकदमे का सामना करवाने से पहले, मजिस्ट्रेट को यह संतोष होना चाहिए कि शिकायत का पर्याप्त आधार है। कभी‑कभी केवल दस्तावेज़ और मौखिक बयान पर्याप्त नहीं होते—मजिस्ट्रेट को वास्तविक स्थान का निरीक्षण आवश्यक हो सकता है (उदाहरण के लिए, विवादित संपत्ति की सीमा) या उचित आकलन के लिए विशेषज्ञ तकनीकी इनपुट चाहिए हो सकता है (जैसे कथित जाली हस्ताक्षर या चिकित्सीय आघात पर राय)। भारतीय दंड प्रक्रिया की दीर्घकालीन परंपरा, जो कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर से चली आ रही है, के अनुरूप यह प्रावधान समन-पूर्व जांच चरण में मजिस्ट्रेट को ऐसी जांच संबंधी लचीलापन देता है, जिससे कमज़ोर या अवांछित शिकायतें छांटी जा सकें और अनावश्यक रूप से आरोपी को मुकदमे में न घसीटा जाए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: मजिस्ट्रेट को हर शिकायत पर निर्णय करने से पहले अनिवार्य रूप से जाँचकर्ता भेजना या विशेषज्ञ बुलाना ही होगा।

    तथ्य: ‘हो सकता है’ (may) शब्द दर्शाता है कि यह विवेकाधीन है—मजिस्ट्रेट इन साधनों का उपयोग केवल आवश्यक होने पर करता है, हर मामले में नहीं।

  • मिथक: यह धारा प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) वाली जाँच की तरह पूर्ण पुलिस अन्वेषण की अनुमति देती है।

    तथ्य: यह मजिस्ट्रेट की स्वयं की जांच के दौरान सीमित तथ्य‑संग्रह का चरण है, जो अन्य प्रावधानों के अंतर्गत होने वाले पूर्ण पुलिस अन्वेषण का विकल्प नहीं है।