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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 100

Search for persons wrongfully confined

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान (पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता में) निहित एक लम्बे समय से चला आ रहा व्यक्तिगत स्वतंत्रता‑संरक्षण है। यह मजिस्ट्रेटों को त्वरित और प्रत्यक्ष साधन देता है ताकि वे अपहरण, बंधुआ मज़दूरी या अवैध अभिरक्षा जैसी स्थितियों में अवैध रूप से रोके गए व्यक्ति को बिना पूर्ण मुकदमे की प्रतीक्षा किए बचा सकें। यह सिद्धान्त दर्शाता है कि स्वतंत्रता का संरक्षण तत्क्षण होना चाहिए, केवल बाद में उपचार पर्याप्त नहीं है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने ऐतिहासिक रूप से समकक्ष प्रावधान (पुरानी CrPC की धारा 97) को एक सुरक्षात्मक, कल्याणोन्मुख शक्ति के रूप में माना है, जिसका उदारतापूर्वक प्रयोग तब किया जाना चाहिए जब अवैध बंदीकरण का विश्वसनीय संदेह हो, विशेषकर महिलाओं, बच्चों या बंधुआ मज़दूरों के मामलों में। न्यायालयों ने बल दिया है कि मजिस्ट्रेट के पास संदेह से परे प्रमाण होना आवश्यक नहीं—केवल ‘विश्वास करने का कारण’ पर्याप्त है—और प्राथमिकता बंदी व्यक्ति की सुरक्षा तथा उसे तुरंत मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कराने की होती है, जिसके बाद मजिस्ट्रेट अभिरक्षा, चिकित्सीय देखभाल या रिहाई जैसी आगे की कार्यवाही तय करता/करती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह केवल अनजान लोगों द्वारा किए गए अपहरण तक सीमित है।

    तथ्य: यह किसी भी ऐसे गलत बंदीकरण पर लागू होता है जो अपराध बनता हो—चाहे वह परिवार के सदस्यों, नियोक्ताओं या अन्य किसी द्वारा किया गया हो।

  • मिथक: मजिस्ट्रेट के लिए कार्रवाई से पहले ठोस, निर्विवाद प्रमाण होना अनिवार्य है।

    तथ्य: कानून केवल ‘विश्वास करने का कारण’—यानी यथोचित संदेह—को पर्याप्त मानता है; तलाशी वारंट जारी करने से पहले संदेह से परे प्रमाण आवश्यक नहीं है।