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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 87

Kidnapping, abducting or inducing woman to compel her marriage, etc

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध 1860 के Indian Penal Code में पहली बार लिखे गए उस संरक्षण की निरंतरता है, जिसका उद्देश्य अपहरण, अभिभवन, भयादोहन या अधिकार के दुरुपयोग द्वारा कराए जाने वाले जबरन विवाह और बाध्य यौन संबंधों को रोकना था। उपनिवेशकालीन विधिनिर्माताओं ने केवल किसी महिला को ले जाने की भौतिक क्रिया ही नहीं, बल्कि उसके पीछे के दबावपूर्ण उद्देश्य को भी अपराध माना, यह स्वीकार करते हुए कि बल या छल से प्राप्त ‘सहमति’ वास्तविक सहमति नहीं होती।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने इसके समान पूर्ववर्ती प्रावधान (Section 366 IPC) की व्याख्या में लगातार कहा है कि अभियोजन को अपहरण या अभिभवन की क्रिया के साथ-साथ यह विशिष्ट आशय या ज्ञान भी सिद्ध करना होता है कि महिला को विवाह या अवैध सहवास के लिए बाध्य किया जाएगा। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि ‘अवैध सहवास’ के लिए वास्तविक सहवास का होना आवश्यक नहीं—आशय या प्रबल संभावना पर्याप्त है। निर्णयों ने यह भी रेखांकित किया है कि यदि महिला नाबालिग है, तो उसकी ‘सहमति’ विधिक रूप से अप्रासंगिक है, क्योंकि वैध अभिभावकत्व से नाबालिग का अपहरण स्वयं में अपराध है, भले ही वह राज़ी दिखाई दे।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: अपराध सिद्ध होने के लिए यह आवश्यक है कि महिला को वास्तव में विवाह या सहवास के लिए बाध्य किया जाए।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि उसे बाध्य करने का आशय या इसकी ज्ञात संभावना पर्याप्त है—उस उद्देश्य से किया गया अपहरण या अभिभवन होते ही अपराध पूर्ण हो जाता है, भले ही बाद में जबरन विवाह या सहवास वास्तव में न हो।

  • मिथक: यदि महिला बाद में विवाह के लिए राज़ी हो जाए, तो कोई अपराध नहीं हुआ।

    तथ्य: बाद में मिली ‘सहमति’, खासकर दबाव में या अभिभवन के बाद, मूल अपराध को नहीं मिटाती; अपराध का मूल्यांकन अपहरण या अभिभवन के समय के आशय से किया जाता है।