Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 88
Causing miscarriage
Whoever voluntarily causes a woman with child to miscarry, shall, if such miscarriage be not caused in good faith for the purpose of saving the life of the woman, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to three years, or with fine, or with both; and, if the woman be quick with child, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine. Explanation.—A woman who causes herself to miscarry, is within the meaning of this section.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान लगभग शब्दशः 1860 के पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 312 का ही निरंतर रूप है, जो स्वयं 19वीं सदी के अंग्रेजी कानून पर आधारित था जिसने गर्भसमापन को अपराध माना। इसकी मूल धारणा गर्भस्थ जीवन की रक्षा करना और असुरक्षित/अनधिकृत प्रक्रियाओं को रोकना थी, साथ ही ऐसे मामलों में अपवाद रखना जहाँ स्त्री का जीवन बचाने के लिए गर्भ समाप्त करना वास्तविक रूप से आवश्यक हो। समय के साथ, चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम, 1971 लागू किया गया, जिसने यह परिभाषित किया कि प्रशिक्षित चिकित्सकों द्वारा किन शर्तों के अधीन गर्भसमापन विधिसम्मत है, और यह दंडात्मक प्रावधान के साथ-साथ कार्य करता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने आम तौर पर ‘सद्भावना’ के अपवाद की संकीर्ण व्याख्या की है—आवश्यक है कि गर्भपात कराने वाले को ईमानदारी से और युक्तिसंगत रूप से यह विश्वास हो कि स्त्री का जीवन बचाने के लिए यह आवश्यक है, न कि केवल सुविधा या एहतियात के लिए। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम, 1971 के तहत योग्य चिकित्सकों द्वारा विधि के अनुसार किए गए गर्भसमापन पर यह धारा लागू नहीं होती, क्योंकि वह अधिनियम वैध गर्भसमापन का ढांचा प्रदान करता है, जबकि यह प्रावधान उस ढांचे से बाहर अवैध या दबाव में कराए गए गर्भसमापनों को लक्षित करता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा यह नहीं कहती कि भारत में सभी गर्भसमापन अवैध हैं।
तथ्य: चिकित्सा गर्भसमापन अधिनियम, 1971 के तहत योग्य चिकित्सकों द्वारा विधि अनुसार किए गए वैध गर्भसमापन इस धारा के अंतर्गत नहीं आते; यह प्रावधान सद्भावना या वैध चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाहर कराए गए गर्भपात/गर्भनाश को निशाना बनाता है।
मिथक: केवल कोई दूसरा व्यक्ति ही इस कानून के तहत दंडित हो सकता है, गर्भवती स्त्री स्वयं कभी नहीं—ऐसा नहीं है।
तथ्य: स्पष्टीकरण में विशेष रूप से कहा गया है कि जो स्त्री स्वयं अपना गर्भपात कराती है, वह भी इसी धारा के अंतर्गत आती है।