Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 6
Fractions of terms of punishment
In calculating fractions of terms of punishment, imprisonment for life shall be reckoned as equivalent to imprisonment for twenty years unless otherwise provided.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
आजीवन कारावास स्वभावतः निश्चित वर्षों की सजा नहीं है — यह प्राकृतिक मृत्यु तक कारावास भी हो सकता है। परंतु अनेक अन्य कानून (उदाहरणतः रिमिशन, परोल पात्रता, सजा का निलंबन, या सजाओं का संचयन) कुल सजा का ‘भिन्नांश’ निकालने की मांग करते हैं, जो किसी निश्चित संख्या के बिना संभव नहीं। यही कारण है कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 57 से ग्रहण की गई यह व्यवस्था, केवल ऐसे अंकगणितीय प्रयोजनों के लिए, एक विधिक कल्पना रचती है — जिसके तहत आजीवन कारावास को 20 वर्ष के समतुल्य माना जाता है। यह वास्तविक आजीवन सजा को कम नहीं करती।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उच्चतम न्यायालय ने, विशेषकर Gopal Vinayak Godse v. State of Maharashtra (1961) में, स्पष्ट किया कि यह नियम केवल विशिष्ट वैधानिक भिन्नांशों की गणना के लिए एक साधन है और इसका अर्थ यह नहीं कि आजीवन दंडित व्यक्ति 20 वर्ष बाद अपने-आप मुक्त हो जाएगा। बाद के मामलों, जैसे Maru Ram v. Union of India (1980) तथा Swamy Shraddananda v. State of Karnataka (2008), ने पुनः पुष्टि की कि ‘आजीवन कारावास’ का सामान्य अर्थ है दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग तक कारावास; और उससे पहले रिहाई के लिए उपयुक्त सरकार द्वारा विधिवत रिमिशन या कम्यूटेशन (commutation) का आदेश आवश्यक है, न कि यह गणितीय कल्पना।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: भारत में आजीवन कारावास का अर्थ ठीक-ठीक 20 वर्ष की सजा होना है।
तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि ‘आजीवन कारावास’ का सामान्य अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग तक कारावास है। ‘20 वर्ष’ केवल अन्य नियमों के तहत भिन्नांश निकालने के लिए प्रयुक्त एक काल्पनिक संख्या है, वास्तविक रिहाई की तारीख नहीं।
मिथक: 20 वर्ष पूरे होते ही आजीवन दंडित व्यक्ति स्वतः रिहा हो जाता है।
तथ्य: आजीवन सजा समाप्त होने से पहले रिहाई के लिए उपयुक्त सरकार द्वारा विधिवत रिमिशन या कम्यूटेशन (commutation) का औपचारिक आदेश आवश्यक है — इस धारा के कारण यह स्वतः नहीं होता।