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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 5

Commutation of sentence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सजा-रूपान्तरण की शक्ति भारतीय दण्ड कानून में लम्बे समय से विद्यमान है (पहले भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धाराएँ 54, 55 और 55A के अंतर्गत), ताकि कार्यपालिका को कठोर सजाओं को कम करने में लचीलापन मिले—जैसे मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलना—और इसके लिए कैदी की सहमति का इंतज़ार न करना पड़े और न ही उसकी आवश्यकता हो। यह मान्यता देता है कि परिस्थितियाँ (स्वास्थ्य, आयु, तथ्यगत परिवर्तन, नीतिगत कारण) कभी-कभी दया का औचित्य सिद्ध कर सकती हैं, भले ही दोषी स्वयं इसकी मांग न करे। केन्द्र और राज्य सरकार के बीच शक्ति का यह विभाजन भारत की संघीय संरचना का प्रतिबिम्ब है: जिस सरकार के पास अपराध के विषय पर कार्यपालिका का अधिकार है, उसी के पास उसके अधीन अपराधों में सजा-रूपान्तरण की शक्ति रहती है, जिससे उपयुक्त स्तर की सरकार निर्णय लेती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पहले की, समान शब्दावली वाली, आईपीसी प्रावधानों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने Maru Ram v. Union of India (1980) में स्पष्ट किया कि यह कार्यपालिकीय रूपान्तरण-शक्ति एक वैधानिक शक्ति है, जो राष्ट्रपति और राज्यपाल के संविधानगत क्षमादान अधिकारों (अनुच्छेद 72 और 161) से भिन्न है, और इसे कानून द्वारा विनियमित किया जा सकता है (जैसे, रियायत/परिवर्तन पर शर्तें लगाना)। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि उपयुक्त सरकार को प्रासंगिक तथ्यों पर विचार कर, गैर-मनमाने ढंग से कार्य करना चाहिए, क्योंकि रूपान्तरण, सहमति आवश्यक न होने पर भी, व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: दोषी की सजा रूपान्तरित करने से पहले उसकी सहमति आवश्यक है।

    तथ्य: यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि अपराधी की सहमति के बिना भी सरकार सजा का रूपान्तरण कर सकती है।

  • मिथक: भारत में किसी भी सजा का रूपान्तरण केवल केन्द्र सरकार ही कर सकती है।

    तथ्य: शक्ति का बँटवारा है: मृत्युदंड और संघ-संबंधी अपराध केन्द्र सरकार देखती है, जबकि राज्य सरकारें अपने कार्यपालिका अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अन्य अपराधों में रूपान्तरण करती हैं।

  • मिथक: रूपान्तरण (commutation) क्षमादान के समान ही होता है।

    तथ्य: अदालतों ने इस वैधानिक रूपान्तरण-शक्ति को राष्ट्रपति या राज्यपाल के संविधानगत क्षमादान अधिकारों (अनुच्छेद 72 और 161) से अलग माना है।