Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 108
Abetment of suicide
If any person commits suicide, whoever abets the commission of such suicide, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता की पूर्व धारा 306 को आगे बढ़ाता है, जो स्वयं उन्नीसवीं शताब्दी के औपनिवेशिक कानून से विकसित हुई थी, जिसका उद्देश्य उत्पीड़न, क्रूरता, बलपूर्वक दबाव या प्रत्यक्ष प्रोत्साहन के माध्यम से दूसरों को आत्महत्या की ओर धकेलने वालों को दंडित करना था। दहेज मृत्यु, कार्यस्थल या पारिवारिक उत्पीड़न, तथा उन मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण बना जहाँ किसी असुरक्षित व्यक्ति को किसी अन्य के सोचे-समझे आचरण से आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया गया। कानून का प्रयास उकसाने वाले (एबेटर) की जवाबदेही तय करना है, न कि आत्महत्या के कृत्य को अपराधित करना—क्योंकि पीड़ित द्वारा आत्महत्या अब भारतीय कानून के तहत दंडनीय अपराध नहीं मानी जाती।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि यहाँ ‘उकसावे’ (एबेटमेंट) का अर्थ संहिता में अन्यत्र परिभाषित कड़े मानकों—उकसावा, आपराधिक साज़िश, या जानबूझकर दी गई सहायता—को पूरा करना है; इसे हल्के में नहीं माना जा सकता। State of West Bengal v. Orilal Jaiswal तथा M. Mohan v. State of Tamil Nadu जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मात्र उत्पीड़न, झगड़े, या मांगलिक/कठोर स्वभाव पर्याप्त नहीं है; ऐसा स्पष्ट, निकटवर्ती और उद्देश्यपूर्ण कृत्य होना चाहिए जिसने मृतक को चरम कदम के अलावा कोई विकल्प न छोड़ा हो। अदालतों ने आरोपी के आचरण और आत्महत्या के बीच प्रत्यक्ष कड़ी (‘निकट कारण’) की आवश्यकता पर भी बल दिया है, और पारिवारिक या वैवाहिक विवादों में इस प्रावधान के दुरुपयोग से सावधान रहने की हिदायत दी है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: जो भी व्यक्ति उस इंसान के प्रति बुरा व्यवहार करता था और बाद में वह इंसान आत्महत्या कर बैठा—ऐसे हर व्यक्ति को इस कानून के तहत जेल हो सकती है।
तथ्य: अदालतें आत्महत्या की ओर स्पष्ट उकसावे, साज़िश, या जानबूझकर दी गई मदद का प्रमाण मांगती हैं—सिर्फ साधारण उत्पीड़न या तकरार पर्याप्त नहीं।
मिथक: यह धारा उस व्यक्ति को दंडित करती है जिसने आत्महत्या का प्रयास किया हो या आत्महत्या की हो।
तथ्य: यह प्रावधान केवल उकसाने वाले (एबेटर) को दंडित करता है; आत्महत्या का प्रयास अब भारतीय कानून के तहत दंडनीय अपराध नहीं है।
मिथक: दस वर्ष का कारावास अनिवार्य न्यूनतम सज़ा है।
तथ्य: कानून केवल अधिकतम दस वर्ष की सीमा तय करता है; परिस्थितियों के अनुसार अदालतें इससे कम सज़ा और जुर्माना दे सकती हैं।