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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 107

Abetment of suicide of child or person of unsound mind

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आम आत्महत्या-अपराध-सहयोग (जिसका प्रावधान संहिता के अन्य भाग में है) की अधिकतम सजा कम है। यह धारा उन मामलों को अलग से चिन्हित करती है जहाँ पीड़ित विशेष रूप से असुरक्षित था—बच्चा, मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति, उन्मादी/विक्षिप्त दशा में व्यक्ति, या नशे में व्यक्ति—क्योंकि ऐसे लोग अपने विरुद्ध होने वाले बहकावे, दबाव या प्रलोभन को पूरी तरह समझने या उसका प्रतिरोध करने में सक्षम नहीं होते। विधायिका इस असुरक्षा का शोषण करने को अपराध का अधिक घोर रूप मानती है, जो बहुत कड़ी सज़ा—यहाँ तक कि मृत्यु दंड—का पात्र है, ताकि कमजोर जनों के शिकार करने वाले शोषणकारी व्यवहार को रोका जा सके.

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

इस धारा के पूर्ववर्ती प्रावधान (Indian Penal Code, 1860 की Section 305, जिसका स्थान यह धारा लेती है) की व्याख्या करते हुए न्यायालयों ने कहा है कि ‘अपराध-सहयोग’ सिद्ध करने के लिए उकसावे, षड्यंत्र, या जानबूझकर की गई सहायता के ठोस प्रमाण आवश्यक हैं—सिर्फ उपस्थित रहना या नैतिक रूप से रोक न पाना पर्याप्त नहीं है। उच्चतर सज़ा लगाने से पहले न्यायालय यह भी परखते रहे हैं कि पीड़ित सचमुच संरक्षित श्रेणी में आता था या नहीं (उदाहरण के लिए, मस्तिष्क की अस्वस्थता सिद्ध होना, या नशे की अवस्था आत्महत्या के निकट समय में होना).

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ किसी को आत्महत्या से न रोक पाना भी इस धारा के अंतर्गत अपराध-सहयोग माना जाता है.

    तथ्य: न्यायालय सामान्यतः यह मांगते रहे हैं कि अपराध-सहयोग सिद्ध करने के लिए उकसावे, षड्यंत्र, या जानबूझकर की गई सहायता का स्पष्ट प्रमाण हो—सिर्फ उपस्थिति या निष्क्रियता पर्याप्त नहीं है.

  • मिथक: यह धारा किसी भी आत्महत्या के मामले पर लागू होती है.

    तथ्य: यह केवल तब लागू होती है जब मृत व्यक्ति उस समय बच्चा, विक्षिप्त/असंयत मस्तिष्क वाला, उन्मादी, या नशे की अवस्था में था; अन्य आत्महत्या के मामले अलग, कम कड़े प्रावधान के अंतर्गत आते हैं.