The Constitution of India
अनुच्छेद 64
उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना
उपराष्ट्रपति का राज्य सभा का पदेन सभापति होना— उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा: परंतु जिस किसी अवधि के दौरान उपराष्ट्रपति, अनुच्छेद 65 के अधीन राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है, उस अवधि के दौरान वह राज्य सभा के सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करेगा और वह अनुच्छेद 97 के अधीन राज्य सभा के सभापति को संदेय वेतन या भत्ते का हकदार नहीं होगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माताओं ने उपराष्ट्रपति के पद और उच्च सदन के नेतृत्व के बीच एक स्पष्ट, स्वचालित जुड़ाव चाहा, ताकि राज्य सभा के अध्यक्ष के लिए अलग चुनाव से बचा जा सके और संसदीय व्यवस्था में उपराष्ट्रपति की संतुलनकारी भूमिका मजबूत हो। परन्तु उपबंध इसलिए रखा गया कि यदि उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति के कार्य करने पड़ें, तो वे एक ही समय में सदन भी न चलाएँ और राष्ट्रप्रमुख भी न बनें—दोनों भूमिकाएँ साथ निभाने से कार्य-सीमा धुंधली हो सकती है, अधिकार-टकराव या दोहरे पारिश्रमिक की स्थिति बन सकती है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: राज्य सभा के अध्यक्ष का चुनाव उसके सदस्यों द्वारा अलग से किया जाता है।
तथ्य: राज्य सभा के अध्यक्ष का पद उपराष्ट्रपति को स्वतः मिलता है; इस विशेष अध्यक्षता के लिए कोई अलग चुनाव नहीं होता।
मिथक: उपराष्ट्रपति एक ही समय में राज्य सभा के अध्यक्ष की भूमिका निभा सकते हैं और साथ ही राष्ट्रपति का कार्य भी कर सकते हैं।
तथ्य: अनुच्छेद 64 के उपबंध में इसे स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया गया है—कार्यवाहक राष्ट्रपति रहते हुए उपराष्ट्रपति राज्य सभा के अध्यक्ष के कर्तव्य नहीं निभा सकते और उस पद का वेतन भी नहीं ले सकते।