The Constitution of India
अनुच्छेद 335
सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावे
सेवाओं और पदों के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के दावे — संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियां करने में, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों का प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार ध्यान रखा जाएगा: ] 1परन्तु इस अनुच्छेद की कोई बात अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के पक्ष में, संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं के किसी वर्ग या वर्गों में या पदों पर प्रोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए, किसी परीक्षा में अर्हक अंकों में छूट देने या मूल्यांकन के मानकों को घटाने के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी ।]
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान-निर्माताओं ने अनुच्छेद 335 को इसलिए शामिल किया कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को ऐतिहासिक रूप से जातिगत भेदभाव के कारण सरकारी नौकरियों से वंचित रखा गया था, और उनके लोक-नियोजन के दावों पर विचार होना चाहिए। साथ ही, निर्माताओं ने “प्रशासन की दक्षता के अनुरक्षण के साथ” यह वाक्यांश संतुलन हेतु जोड़ा, जो संविधान सभा की बहसों में सामाजिक न्याय और प्रशासकीय योग्यता के बीच सामंजस्य की सोच को दर्शाता है। बाद में न्यायिक निर्णयों के पश्चात संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से एक उपबंध जोड़ा गया, जिसने शिथिल अंक और पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति स्पष्ट कर दी, ताकि ‘दक्षता’ वाली भाषा के बावजूद पदोन्नति में आरक्षण की संवैधानिक वैधता स्पष्ट रहे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
इंद्रा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1992) में, सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 16(4) प्रारंभिक नियुक्तियों में आरक्षण की अनुमति देता है, पर पदोन्नति के मामले में उसने अधिक सावधानी बरती और अनुच्छेद 335 के ‘दक्षता’ उपबंध को एक सीमित करने वाले तत्व के रूप में पढ़ा। इससे पदोन्नति में आरक्षण को लेकर अनिश्चितता बनी। संसद ने 77वां, 81वां, 82वां, 85वां संवैधानिक संशोधन करके अनुच्छेद 16(4A) और 16(4B) जोड़े, तथा अनुच्छेद 335 में भी उपबंध जोड़कर शिथिल अंक और पदोन्नति में आरक्षण को स्पष्ट रूप से अनुमत किया। बाद में एम. नागराज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2006) में न्यायालय ने इन संशोधनों को बरकरार रखा, पर शर्त रखी कि पदोन्नति में आरक्षण के लिए पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता का अनुरक्षण जैसे मानदंड पूरे होने चाहिए — यानी अनुच्छेद 335 का दक्षता-सिद्धांत एक संवैधानिक नियंत्रण के रूप में कायम रहा। जਰਨैल सिंह बनाम लच्छी नारायण गुप्ता (2018) में आगे चलकर विशेषकर एससी/एसटी के लिए ‘पिछड़ेपन’ के प्रमाण संबंधी शर्त को नरम किया गया।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 335 स्वयं एससी/एसटी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण निर्मित करता है।
तथ्य: अनुच्छेद 335 आरक्षण नहीं बनाता; वह तो अनुच्छेद 16(4) और 16(4A) से आता है। अनुच्छेद 335 केवल यह कहता है कि एससी/एसटी के दावों पर दक्षता के साथ-साथ विचार किया जाए, और उसका उपबंध शिथिल अंक या पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति देता है (पर अनिवार्य नहीं करता)।
मिथक: ‘प्रशासन की दक्षता’ वाला उपबंध पदोन्नति में आरक्षण पर प्रतिबंध लगाता है।
तथ्य: न्यायालयों और संवैधानिक संशोधनों ने स्पष्ट किया है कि पदोन्नति में आरक्षण अनुमत है; ‘दक्षता’ उपबंध एक कारक है जिसे न्यायालय परखते हैं (नागर्ज के अनुसार), कोई पूर्ण निषेध नहीं — और एससी/एसटी के संदर्भ में यह आवश्यकता जर्नैल सिंह में कुछ नरम भी की गई।