The Constitution of India
अनुच्छेद 304
राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निबंधन
राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निबंधन — अनुच्छेद 301 या अनुच्छेद 303 में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का विधान-मंडल, विधि द्वारा, — (क) अन्य राज्यों 1या संघ राज्यक्षेत्रों] से आयात किए गए माल पर कोई ऐसा कर अधिरोपित कर सकेगा जो उस राज्य में विनिर्मित या उत्पादित वैसे ही माल पर लगता है, किन्तु इस प्रकार कि उससे इस तरह आयात किए गए माल और ऐसे विनिर्मित या उत्पादित माल के बीच कोई विभेद न हो; या (ख) उस राज्य के साथ या उसके भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता पर ऐसे युक्तियुक्त निबंधन अधिरोपित कर सकेगा जो लोक हित में अपेक्षित हों: परंतु खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए कोई विधेयक या संशोधन राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी के बिना किसी राज्य के विधान-मंडल में पुरःस्थापित या प्रस्तावित नहीं किया जाएगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत के संविधान का उद्देश्य एक बड़ा साझा बाज़ार बनाना था (अनुच्छेद 301) ताकि माल, लोग और व्यापार राज्य सीमाओं के पार स्वतंत्र रूप से आ-जा सकें और राष्ट्रीय आर्थिक एकता मज़बूत हो। परंतु निर्माताओं ने यह भी माना कि राज्यों को कुछ लचीलापन चाहिए — ताकि वे स्थानीय उद्योगों को अनुचित कर-हानि से बचा सकें और जनहित के वास्तविक कारणों (जैसे स्वास्थ्य, सुरक्षा, या स्थानीय आर्थिक नियोजन) से व्यापार को विनियमित कर सकें। अनुच्छेद 304 इन दोनों लक्ष्यों में संतुलन स्थापित करता है: यह सीमित, अभेदभावरहित राज्यीय हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जबकि केंद्रीय निगरानी (राष्ट्रपति की स्वीकृति के माध्यम से) सुनिश्चित करता है कि राज्य इन प्रतिबंधों को संरक्षणवादी अवरोधों में न बदल दें जो राष्ट्रीय बाज़ार को खंडित करें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद की व्याख्या को गहराई से आकार दिया है। Atiabari Tea Co. v. State of Assam (1961) में न्यायालय ने माना कि जो कर मुक्त व्यापार में सीधे बाधा डालते हैं, वे अनुच्छेद 301 का उल्लंघन हैं, जब तक कि उन्हें अनुच्छेद 304 के तहत वैध न ठहराया जाए। Automobile Transport (Rajasthan) v. State of Rajasthan (1962) में न्यायालय ने ‘प्रतिपूरक कर’ की धारणा प्रस्तुत की — ऐसे कर जो सड़कों जैसी सेवाओं की लागत भरते हैं — और कहा कि वे अनुच्छेद 301 का उल्लंघन नहीं करते। इससे दशकों तक यह भ्रम बना रहा कि क्या प्रतिपूरक है और क्या भेदभावपूर्ण। अंततः, Jindal Stainless Ltd. v. State of Haryana (2016) में नौ-न्यायाधीशीय पीठ ने प्रतिपूरक कर सिद्धांत को निरस्त कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि केवल वास्तविक भेदभावपूर्ण कर ही अनुच्छेद 304 की कसौटी पर परखे जाएंगे, और यह कि अभेदभावरहित राज्यीय वस्तु-करों को राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: राज्य स्थानीय व्यवसायों की रक्षा के लिए अन्य राज्यों से आने वाले माल को मनमाने ढंग से रोक सकते हैं या अत्यधिक कर लगा सकते हैं।
तथ्य: अनुच्छेद 304(क) भेदभावपूर्ण कराधान को विशेष रूप से निषिद्ध करता है — किसी राज्य को बाहर से आए समान माल पर वही कर लगाना होगा जो वह अपने समान माल पर लगाता है।
मिथक: हर राज्यीय वस्तु-कर के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।
तथ्य: सुप्रीम कोर्ट के 2016 के Jindal Stainless निर्णय के बाद, केवल उपधारा (ख) के अंतर्गत प्रतिबंधों के लिए — न कि उपधारा (क) के अंतर्गत साधारण अभेदभावरहित करों के लिए — विधेयक प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है।