The Constitution of India
अनुच्छेद 273
जूट पर और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के स्थान पर अनुदान
जूट पर और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के स्थान पर अनुदान — (1) जूट पर और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के प्रत्येक वर्ष के शुद्ध आगम का कोई भाग असम, बिहार, 2ओड़िशा] और पश्चिमी बंगाल राज्यों को सौंप दिए जाने के स्थान पर उन राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान के रूप में प्रत्येक वर्ष भारत की संचित निधि पर ऐसी राशियां भारित की जाएंगी जो विहित की जाएं । (2) जूट पर और जूट उत्पादों पर जब तक भारत सरकार कोई निर्यात शुल्क उद्गृहीत करती रहती है तब तक या इस संविधान के प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति तक, इन दोनों में से जो भी पहले हो, इस प्रकार विहित राशियां भारत की संचित निधि पर भारित बनी रहेंगी । (3) इस अनुच्छेद में, “विहित” पद का वही अर्थ है जो अनुच्छेद 270 में है ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
स्वतंत्रता से पहले जूट (मुख्यतः बंगाल और पड़ोसी क्षेत्रों में उगाया जाता था) बड़ा विदेशी मुद्रा अर्जक था, और उस पर लगने वाले निर्यात शुल्क से हुई आमदनी जूट उगाने वाले प्रांतों के साथ बाँटी जाती थी। जब संविधान ने राजस्व शक्तियाँ केंद्र में केंद्रित कीं, तो निर्माताओं ने यह विशेष अंतरिम व्यवस्था की ताकि जूट उत्पादक राज्यों की वह आय एकदम न घट जाए जिस पर वे पहले निर्भर थे, और साथ ही केंद्र सरकार को जूट पर निर्यात शुल्क धीरे-धीरे समाप्त करने की लचीलापन भी मिल सके।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 273 इन राज्यों को जूट निर्यात राजस्व पर स्थायी अधिकार देता है।
तथ्य: ये अनुदान समय-सीमित थे — संविधान के प्रवर्तन से अधिकतम दस वर्ष तक, या जब तक जूट निर्यात शुल्क स्वयं हटा न दिया जाए, जो भी पहले हो।
मिथक: यह अनुच्छेद किसी भी जूट उगाने वाले राज्य पर लागू होता है।
तथ्य: यह विशेष रूप से केवल असम, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का नाम लेता है, किसी अन्य जूट-उत्पादक क्षेत्र का नहीं।