The Constitution of India
अनुच्छेद 23
मानव के दुर्व्यापार और बलातश्रम का प्रतिषेध
मानव के दुर्व्यापार और बलातश्रम का प्रतिषेध-(1) मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलातश्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा । (2) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा अधिरोपित करने से निवारित नहीं करेगी । ऐसी सेवा अधिरोपित करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अनुच्छेद 23 को दासत्व, बंधुआ मजदूरी और बेगार (बिना मजदूरी का जबरन काम, जो प्रायः जमींदारों और औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा निम्न जातियों या गरीबों से कराया जाता था) जैसी गहरी जड़ें जमा चुकी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए जोड़ा गया था। निर्माताओं का उद्देश्य ऐसी शोषणकारी प्रथाओं को केवल सामान्य कानून का नहीं, बल्कि संवैधानिक अपराध का विषय बनाकर मानवीय गरिमा और आर्थिक स्वतंत्रता की गारंटी देना था।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
प्रमुख निर्णय 'People's Union for Democratic Rights v. Union of India' (1982) में, सर्वोच्च न्यायालय ने ठहराया कि ‘जबरन श्रम’ केवल शारीरिक बल तक सीमित नहीं है—न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना भी अनुच्छेद 23 के तहत जबरन श्रम है, क्योंकि आर्थिक विवशता भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध उतना ही मजबूर कर सकती है जितना कोड़े का डर। 'Bandhua Mukti Morcha v. Union of India' (1984) में, न्यायालय ने बंधुआ मजदूरों के संरक्षण का विस्तार किया और राज्य को उन्हें चिन्हित करने, मुक्त कराने और पुनर्वास करने का निर्देश दिया, अर्थात् अनुच्छेद 23 केवल निषेध नहीं, बल्कि राज्य पर एक सकारात्मक कर्तव्य भी अधिरोपित करता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 23 केवल वास्तविक दासत्व या शारीरिक जंजीरों पर ही लागू होता है।
तथ्य: सर्वोच्च न्यायालय ने ठहराया है कि न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना, या गरीबी या ऋण-बन्धन के कारण मजबूरी में काम करवाना, भी अनुच्छेद 23 के तहत जबरन श्रम माना जाता है।
मिथक: सरकार द्वारा अनिवार्य किया गया कोई भी कार्य, जैसे सामुदायिक सेवा या सैन्य भर्ती, अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।
तथ्य: उपबंध (2) स्पष्ट रूप से राज्य को जनउद्देश्य के लिए अनिवार्य सेवा लगाने की अनुमति देता है, बशर्ते इसे धर्म, नस्ल, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव किए बिना लागू किया जाए।