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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 96

repealed

Things done in private defence

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

निजी रक्षा का अधिकार इसलिए है क्योंकि कानून मानता है कि राज्य संरक्षण (पुलिस, न्यायालय) हर बार खतरे के ठीक उसी क्षण व्यक्ति तक नहीं पहुँच सकता। दीर्घकालिक विधिक परंपराओं के आधार पर, भारतीय दण्ड संहिता (Lord Macaulay के अधीन 1860 में तैयार) सामान्य नागरिकों को अपने तथा अन्य के शरीर और संपत्ति की सीमित रक्षा का अधिकार देती है, जब सार्वजनिक प्राधिकार से सहायता माँगने का समय न हो। धारा 96 इस अधिकार की उद्घोषणा है, और बाद की धाराएँ (97-106) इसकी सीमाएँ और शर्तें बताती हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय लगातार मानते आए हैं कि धारा 96 को धाराओं 97 से 106 के साथ पढ़ना चाहिए, जो बताती हैं कि यह अधिकार कब उत्पन्न होता है और उसकी सीमा क्या है। सर्वोच्च न्यायालय ने Darshan Singh v. State of Punjab (2010) जैसे मामलों में स्पष्ट किया कि निजी रक्षा का अधिकार प्रतिशोध लेने का नहीं, बल्कि आसन्न खतरे को टालने का अधिकार है, और प्रयुक्त बल खतरे के अनुपात में होना चाहिए। न्यायालय बार‑बार रेखांकित करते हैं कि यह अधिकार आक्रामक पक्ष के मूल पीड़ित को भी प्राप्त है, परन्तु यह उन स्थितियों तक नहीं फैलता जहाँ खतरा समाप्त हो चुका हो या जहाँ व्यक्ति के पास सार्वजनिक प्राधिकार से सहायता लेने का समय रहा हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 96 आपको यह कह देने भर से कि ‘यह आत्मरक्षा थी’, जो चाहें करने की छूट देती है।

    तथ्य: न्यायालय अपेक्षा करते हैं कि खतरा वास्तविक और तात्कालिक हो, और प्रयुक्त बल उचित व अनुपातिक हो; धाराएँ 97‑106 इन सीमाओं को विस्तार से निर्धारित करती हैं।

  • मिथक: निजी रक्षा में वह प्रतिशोध भी शामिल है जो हमलावर के भाग जाने या खतरा समाप्त हो जाने के बाद लिया जाए।

    तथ्य: न्यायालयों ने ठहराया है कि खतरा समाप्त होते ही यह अधिकार भी समाप्त हो जाता है; बाद में बल का प्रयोग अलग, दंडनीय कृत्य माना जाता है, निजी रक्षा नहीं।