Indian Penal Code, 1860
धारा 95
repealedAct causing slight harm
Nothing is an offence by reason that it causes, or that it is intended to cause, or that it is known to be likely to cause, any harm, if that harm is so slight that no person of ordinary sense and temper would complain of such harm.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह धारा उस विधि-सिद्धांत ‘de minimis non curat lex’ (कानून तुच्छ बातों पर ध्यान नहीं देता) का प्रतिबिंब है। भारतीय दंड संहिता (IPC) के निर्माणकर्ताओं ने माना कि दंड विधि का ध्यान वास्तविक और अर्थपूर्ण अन्याय पर होना चाहिए, रोज़मर्रा की जीवन-चर्या के छोटे-मोटे झंझटों पर नहीं। ऐसी व्यवस्था के बिना, अदालतें हल्की टक्कर, क्षणिक स्पर्श, या नगण्य असुविधा जैसी तुच्छ शिकायतों से भर सकती थीं, जिससे न्यायिक संसाधन व्यर्थ जाते और सामान्य मानवीय व्यवहार का अपराधीकरण हो जाता।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय अदालतों ने धारा 95 का सावधानी से और सीमित रूप में प्रयोग किया है, यह रेखांकित करते हुए कि हानि एक साधारण, विवेकशील व्यक्ति के दृष्टिकोण से सचमुच तुच्छ होनी चाहिए—अत्यधिक संवेदनशील शिकायतकर्ता के नजरिए से नहीं। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि यह धारा ऐसी हानि को माफ़ नहीं करती जो क्षणिक हो सकती है पर महत्वहीन नहीं, और यह कि आशय व संदर्भ अब भी मायने रखते हैं। इसे अक्सर हल्की झड़पों, अनायास हुए स्पर्श, या नगण्य संपत्ति-हानि के मामलों में उठाया जाता है, पर न्यायालय यह भी देखते हैं कि इसका उपयोग असली अपराधों के लिए चादर न बन जाए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 95 का अर्थ यह नहीं है कि छोटी चोटें हमेशा वैध हैं।
तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि हानि सच में साधारण व्यक्ति की दृष्टि से तुच्छ होनी चाहिए; यदि हानि वास्तविक है या पीड़ित की शिकायत वाजिब है, तो यह धारा लागू नहीं होती।
मिथक: यह धारा किसी भी छोटे आपराधिक कृत्य को माफ़ नहीं कर देती केवल इसलिए कि आरोपी कह दे ‘यह कोई बड़ी बात नहीं थी।’
तथ्य: कसौटी वस्तुनिष्ठ है—यानी एक साधारण, विवेकशील व्यक्ति क्या सोचेगा—न कि आरोपी की निजी राय कि बात तुच्छ थी।