Indian Penal Code, 1860
धारा 92
repealedAct done in good faith for benefit of a person without consent
Nothing is an offence by reason of any harm which it may causes to a person for whose benefit it is done in good faith, even without that person’s consent, if the circumstances are such that it is impossible for that person to signify consent, or if that person is incapable of giving consent, and has no guardian or other person in lawful charge of him from whom it is possible to obtain consent in time for the thing to be done with benefit;
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
धारा 92 यह मानती है कि आपातकाल और लाचारी की स्थितियों में कभी‑कभी सहमति मिलने से पहले ही किसी के हित में त्वरित कार्रवाई करनी पड़ती है। यह धारा 88 (हानि के लिए सहमति) के तर्क को उन परिस्थितियों तक बढ़ाती है जहाँ सचमुच सहमति लेना असंभव हो — जैसे चिकित्सीय आपातकाल, अचेत पीड़ित, या जोखिम में छोटे बच्चे। यह प्रावधान देहगत स्वायत्तता की रक्षा और सद्भावना में बचाव/देखभाल की अनुमति — दोनों के बीच संतुलन बनाता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने धारा 92 को मुख्यतः चिकित्सकीय लापरवाही और आपात उपचार से जुड़े प्रकरणों में लागू किया है, यह ठहराते हुए कि आपातकाल में रोगी का जीवन बचाने के लिए सद्भावना में कार्य करने वाले चिकित्सक — जब समय पर सहमति लेना असंभव हो — आपराधिक दायित्व से संरक्षित रहते हैं, बशर्ते उनका आचरण युक्तिसंगत देखभाल के मानक पर खरा उतरे और वह लापरवाह या उतावला न हो।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारा डॉक्टरों या किसी को भी जब‑तब, केवल अपनी समझ से, बिना सहमति के काम करने की खुली छूट देती है।
तथ्य: यह तभी लागू होती है जब समय रहते सहमति लेना सच‑मुच असंभव था, या व्यक्ति विधिक रूप से सहमति देने में अक्षम था और कोई अभिभावक उपलब्ध नहीं था — केवल निजी मत या सुविधा के लिए नहीं।
मिथक: धारा 92 किसी व्यक्ति के ‘हित’ में की गई हानि के सभी प्रकारों को समाहित करती है।
तथ्य: धारा (अपने अधिक पूर्ण मूल रूप में) अपवाद भी रखती है — यह जानबूझकर मृत्यु कारित करने जैसे कृत्यों को संरक्षण नहीं देती, जब तक विशेष शर्तें पूरी न हों; और यह सदा सद्भावना की अपेक्षा करती है, मात्र दावे भर की ‘अच्छी नीयत’ काफी नहीं।