Indian Penal Code, 1860
धारा 85
repealedAct of a person incapable of judgment by reason of intoxication caused against his will
Nothing is an offence which is done by a person who, at the time of doing it, is, by reason of intoxication, incapable of knowing the nature of the act, or that he is doing what is either wrong, or contrary to law: Provided that the thing which intoxicated him was administered to him without his knowledge or against his will.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय दंड संहिता, जिसे 1860 के दशक में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन तैयार किया गया, ने इस प्रावधान को धारा 84 (मति-भ्रंश/अविवेक) के संकुचित सहचर के रूप में गढ़ा। विधिनिर्माताओं ने माना कि नशा भी व्यक्ति की मानसिक क्षमता को उसी तरह नष्ट कर सकता है जैसे पागलपन करता है, पर वे नहीं चाहते थे कि कोई जानबूझकर नशा कर दंड से बच निकले और दोष शराब पर मढ़ दे। इसलिए इस बचाव को जानबूझकर नशा करने के बजाय केवल उन स्थितियों तक सीमित किया गया जहाँ व्यक्ति के पास नशे में जाने का वास्तविक विकल्प ही न हो—जैसे किसी ने चुपके से उसका पेय मिलावट कर दिया हो या बलपूर्वक नशीला पदार्थ पिला दिया हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, विशेषकर Basdev v. State of PEPSU (1956) में, धारा 85 (अनैच्छिक नशा) और स्वैच्छिक मद्यपान के बीच स्पष्ट रेखा खींची है, जहाँ स्वैच्छिक नशे का पृथक रूप से धारा 86 के अधीन मूल्यांकन होता है। न्यायालयों ने माना है कि स्वैच्छिक नशा सामान्यतः कोई बहाना नहीं है और ऐसे मामलों में व्यक्ति को ऐसे आंका जाता है मानो उसे अपने कृत्यों का पूर्ण ज्ञान था, जबकि धारा 85 का संरक्षण वास्तविक अनैच्छिक नशे के विरल मामलों के लिए सुरक्षित है—जैसे बिना सहमति के नशीला पदार्थ दे दिया जाना। न्यायाधीशों ने यह भी रेखांकित किया है कि अभियुक्त को यह सिद्ध करना होगा कि वह कृत्य के स्वभाव या उसकी गलतता को समझने में लगभग पूर्णतः अक्षम था; केवल निर्णय-क्षमता का घट जाना या आत्म-नियंत्रण में कमी पर्याप्त नहीं है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कथन गलत है: स्वेच्छा से नशे में होकर अपराध करना इस धारा के अंतर्गत क्षम्य नहीं है।
तथ्य: धारा 85 केवल उन्हीं लोगों की रक्षा करती है जिन्हें नशा बिना उनकी जानकारी के कराया गया हो या उनकी इच्छा के विरुद्ध थोपा गया हो; स्वैच्छिक नशे का पृथक रूप से धारा 86 के अधीन निपटारा होता है और सामान्यतः वह पूर्ण रक्षा नहीं है।
मिथक: यह कथन गलत है: हल्की मदहोशी या निर्णय-क्षमता में कमी मात्र से यह defesa नहीं मिलती।
तथ्य: न्यायालय यह अपेक्षा करते हैं कि व्यक्ति इतना अधिक नशे में हो कि वह कृत्य का स्वभाव या उसकी गलतता समझने में असमर्थ रहा हो—सिर्फ निषेधों का ढीला पड़ना या खराब निर्णय-क्षमता पर्याप्त नहीं मानी जाती।