Indian Penal Code, 1860
धारा 84
repealedAct of a person of unsound mind
Nothing is an offence which is done by a person who, at the time of doing it, by reason of unsoundness of mind, is incapable of knowing the nature of the act, or that he is doing what is either wrong or contrary to law.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
धारा 84 ‘उन्माद बचाव’ (insanity defence) का भारतीय रूप है, जिसकी जड़ें अंग्रेजी एम’नॉटन नियम (M'Naghten Rules, 1843) में हैं, जो डैनियल एम’नॉटन के उन्माद के कारण हत्या से बरी होने के बाद विकसित हुए। कानून मानता है कि दंडात्मक उत्तरदायित्व के लिए अपराधी मन (mens rea) आवश्यक है — अपने कृत्यों और उनकी नैतिक अथवा विधिक गलतता को समझने की मूल क्षमता। जो व्यक्ति वास्तविक मानसिक रोग के कारण इस क्षमता से वंचित है, उसे सामान्य समझ-बूझ वाले व्यक्ति की तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता; ऐसे में दंड न तो न्याय के उद्देश्य पूरे करता है, न ही निवारण के।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय निरन्तर मानते आए हैं कि धारा 84 के तहत ‘कानूनी उन्माद’ (legal insanity) का प्रमाण आवश्यक है, मात्र ‘चिकित्सीय उन्माद’ (medical insanity) पर्याप्त नहीं — किसी को मनोचिकित्सीय निदान होने पर भी, यदि वह अपने कृत्य का स्वरूप और उसकी गलतता समझता था, तो वह कानूनन समझदार माना जा सकता है। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि मन:अस्वस्थता सिद्ध करने का दायित्व अभियुक्त पर है (साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 के अधीन), और केवल असामान्यता, सनक, या मानसिक रोग का इतिहास पर्याप्त नहीं। कृत्य से पहले, दौरान और बाद के व्यवहार — जैसे साक्ष्य छिपाने या भागने के प्रयास — से अक्सर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि व्यक्ति को कृत्य की गलतता का बोध था या नहीं। Surendra Mishra v. State of Jharkhand (2011) जैसे वादों ने पुष्ट किया कि निर्णायक कसौटी वही है: अपराध के ठीक समय अभियुक्त की संज्ञानात्मक क्षमता, न कि उसका सामान्य मानसिक इतिहास।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी मानसिक रोग अपने-आप अपराध से छूट दे देता है।
तथ्य: अदालतें ‘कानूनी उन्माद’ (legal insanity) की माँग करती हैं — यह प्रमाण कि व्यक्ति विशेष उसी समय अपने कृत्य का स्वरूप या उसकी गलतता नहीं समझ सका; मात्र सामान्य मनोचिकित्सीय निदान पर्याप्त नहीं।
मिथक: धारा 84 का अर्थ है कि व्यक्ति बिना किसी परिणाम के मुक्त हो जाता है।
तथ्य: धारा 84 के तहत बरी होने पर भी, व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी कानूनों के अंतर्गत उपचार और जन-सुरक्षा के लिए निरुद्ध किया जा सकता है; उसे सरलता से रिहा नहीं किया जाता।
मिथक: अभियोजन को सिद्ध करना होता है कि अभियुक्त समझदार था।
तथ्य: साक्ष्य अधिनियम की धारा 105 के अनुसार, मन:अस्वस्थता सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर है; अभियोजन पर इसे खण्डित करने का भार नहीं होता।