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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 83

repealed

Act of a child above seven and under twelve of immature understanding

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आपराधिक कानून सामान्यतः ‘दोषी मन’ (mens rea) — यानी यह समझ — की मांग करता है कि कृत्य गलत है। बहुत छोटे बच्चों में यह समझ नहीं हो सकती, इसलिए कानून उन्हें आपराधिक दायित्व से बचाता है। धारा 82, समझ हो या न हो, 7 वर्ष से कम के बच्चों को पूर्ण संरक्षण देती है। धारा 83, 7 से 12 वर्ष के बीच के बच्चों को शर्तसहित, प्रत्येक मामले के तथ्यों पर आधारित संरक्षण देती है, मानते हुए कि मानसिक विकास बच्चे-बच्चे में भिन्न होता है; इसलिए न्यायालयों को किसी एकरूप अनुमान के बजाय उस विशेष बच्चे की परिपक्वता का वास्तविक आकलन करना चाहिए।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने इसे स्वत: ढाल नहीं, बल्कि खंडनीय अनुमान माना है: बचाव पक्ष को बच्चे के आचरण, पृष्ठभूमि और कृत्य की परिस्थितियों (जैसे सबूत छिपाने की कोशिश, बयानों में झलकती समझ, या की गई योजना) से दिखाना होता है कि बच्चे में कृत्य के स्वरूप और परिणाम समझने की पर्याप्त परिपक्वता नहीं थी। भारतीय न्यायालयों ने इस आयु वर्ग के लिए कोई एक समान मानक तय न होने के कारण, कृत्य से पहले और बाद के व्यवहार, स्कूल का अभिलेख, तथा गवाहों की गवाही जैसे साक्ष्यों को देखकर, प्रत्येक मामले में अलग से परिपक्वता का निर्णय किया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: 7 से 12 वर्ष के सभी बच्चों को हर अपराध से अपने-आप छूट मिलती है।

    तथ्य: संरक्षण स्वत: नहीं मिलता — यह इस बात पर निर्भर है कि उस विशेष बच्चे में उस समय कृत्य के स्वरूप और परिणाम समझने की पर्याप्त परिपक्वता का अभाव सिद्ध किया जाए (सरलीकृत).

  • मिथक: धारा 83 और धारा 82 समान संरक्षण देती हैं।

    तथ्य: धारा 82, 7 वर्ष से कम आयु के बच्चों को बिना किसी शर्त के पूर्ण प्रतिरक्षा देती है, जबकि धारा 83, 7 से कम-अर्थात 12 वर्ष से नीचे की आयु समूह में, बच्चे की समझ पर मामले-विशेष के आधार पर निष्कर्ष चाहती है।