Indian Penal Code, 1860
धारा 81
repealedAct likely to cause harm, but done without criminal intent, and to prevent other harm
Nothing is an offence merely by reason of its being done with the knowledge that it is likely to cause harm, if it be done without any criminal intention to cause harm, and in good faith for the purpose of preventing or avoiding other harm to person or property.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह उपबंध सामान्य विधि के ‘आवश्यकता’ (necessity) सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है—अर्थात व्यक्ति को दो बुराइयों में से छोटी बुराई चुनने पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता (IPC) के निर्माताओं ने, अंग्रेज़ी आपराधिक विधि के सिद्धांतों से प्रेरित होकर, आपात स्थितियों में कार्य करने वालों को (जैसे किसी कप्तान का बड़े हादसे से बचने के लिए जहाज़ को कम हानि वाले मार्ग में मोड़ना, या किसी चिकित्सक का जोखिमपूर्ण किन्तु आवश्यक उपचार करना) केवल इस आधार पर अपराधी ठहराए जाने से बचाना चाहा कि उनके कृत्य में प्रत्याशित जोखिम था। इसमें निहित मुख्य सुरक्षा-प्रावधान हैं सद्भावना और आपराधिक अभिप्राय का अभाव—कानून लापरवाही या द्वेष को ‘आवश्यकता’ का रूप देकर संरक्षण नहीं देता।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने धारा 81 की संकीर्ण व्याख्या की है और ‘सद्भावना’ (जिसकी परिभाषा IPC में उचित सावधानी और ध्यान की अपेक्षा के साथ दी गई है) को केन्द्रीय माना है—सिर्फ अच्छे इरादे का दावा पर्याप्त नहीं। न्यायालय यह देखते हैं कि टाला गया नुकसान वास्तविक और गंभीर था या नहीं, अभियुक्त के पास यथोचित विकल्प थे या नहीं, और उठाया गया कदम समुपातिक था या नहीं। इस धारा पर प्रायः IPC की दृष्टांतों के साथ चर्चा होती है (जैसे टक्कर टालने हेतु जहाज़ का मार्ग बदलना, भले कुछ प्राण जोखिम में पड़ें, अनेक अन्य प्राण बचाने के लिए) ताकि सच्ची आवश्यकता और छिपे अपराध के बीच भेद परखा जा सके।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि मैं कह दूँ कि मेरा आशय अच्छा था, तो मुझे स्वतः ही इस धारा के तहत संरक्षण मिल जाता है।
तथ्य: न्यायालय वास्तविक सद्भावना (सावधानी और ईमानदारी) तथा इस बात का प्रमाण चाहते हैं कि कोई वास्तविक और गंभीर नुकसान टाला जा रहा था—सिर्फ अच्छे इरादे का दावा पर्याप्त नहीं है।
मिथक: यह धारा किसी भी जोखिमभरे कृत्य को वैध ठहरा देती है, बशर्ते अंततः किसी को वास्तविक चोट न लगी हो।
तथ्य: यह धारा केवल तब लागू होती है जब हानि होने की संभावना यथोचित रूप से थी और उसे बड़े नुकसान को टालने के लिए जानबूझकर जोखिम में लिया गया—यह लापरवाह या अनावश्यक जोखिम उठाने को क्षम्य नहीं ठहराती।