Indian Penal Code, 1860
धारा 80
repealedAccident in doing a lawful act
Nothing is an offence which is done by accident or misfortune, and without any criminal intention or knowledge in the doing of a lawful act in a lawful manner by lawful means and with proper care and caution.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रतिरक्षा दंड विधि के उस मूल सिद्धांत को दर्शाती है कि दंड के लिए अपराधी मन (मेंस रिया [mens rea]) आवश्यक है। अंग्रेज़ी कॉमन लॉ ने लम्बे समय से माना है कि वैध और सावधानीपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति को ऐसे परिणामों के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए जिन्हें वह न तो भांप सकता था न नियंत्रित कर सकता था। इस परंपरा से प्रेरित होकर आईपीसी (1860) के रचनाकारों ने धारा 80 जोड़ी, ताकि लोगों को सच्चे दुर्भाग्य के लिए अपराधी न बनाया जाए, और सामान्य वैध गतिविधियाँ (जैसे खेल, हाथ का काम, या ड्राइविंग) बिना विचित्र दुर्घटनाओं पर अभियोजन के भय के प्रोत्साहित हों।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने माना है कि धारा 80 की सभी शर्तें साथ‑साथ पूरी होनी चाहिए: कृत्य स्वयं वैध हो, वैध तरीके से हो, वैध साधनों से हो, और उचित सावधानी के साथ हो। जहाँ अभियुक्त लापरवाह या उद्दंड रहा हो, या जहाँ मूल कृत्य ही अवैध रहा हो (उदा., अवैध शिकार, अवैध चिकित्सीय उपचार, या लापरवाही से बंदूक चलाना) वहाँ अदालतों ने यह प्रतिरक्षा अस्वीकार की है, भले ही अंतिम चोट अनिच्छित रही हो। आकस्मिक गोली चलने, खेल‑कूद की चोटों, और कार्यस्थल दुर्घटनाओं वाले मामलों में यह परखा गया है कि ‘उचित सावधानी और सतर्कता’ वास्तव में बरती गई थी या नहीं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 80 उस किसी भी व्यक्ति की रक्षा करती है जिसकी ‘हानि पहुँचाने की मंशा’ नहीं थी।
तथ्य: अदालतें यह अपेक्षा करती हैं कि कृत्य स्वयं वैध हो, वैध तरीके से किया गया हो, और उचित सावधानी के साथ किया गया हो — केवल बुरी मंशा का न होना पर्याप्त नहीं है।
मिथक: यह धारा परिणाम अनिच्छित होने तक लापरवाही को माफ कर देती है।
तथ्य: यदि उचित सावधानी या सतर्कता का अभाव रहा, तो यह प्रतिरक्षा लागू नहीं होगी, चाहे हानि अनिच्छित ही क्यों न रही हो।