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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 79

repealed

Act done by a person justified, or by mistake of fact believing himself, justified, by law

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान उन्नीसवीं सदी के मध्य में मैकाले के अधीन विधि आयोग द्वारा तैयार भारतीय दंड संहिता की ‘सामान्य अपवाद’ श्रेणी का हिस्सा है। दंडात्मक दायित्व सामान्यतः अपराध-संकेतक मन (मेन्स रिआ [mens rea]) की मांग करता है। प्रन्यस्ताओं ने उन लोगों की रक्षा करना चाहा जो तथ्यों की गलतफहमी में, ईमानदारी से, उस कर्तव्य या अधिकार का पालन करते हुए कार्य कर रहे थे जिसे वे वैध मानते थे — जैसे कोई सैनिक या पुलिसकर्मी जो उन आदेशों पर कार्य करे जिन्हें वह युक्तिसंगत रूप से वैध समझता था। साथ ही, उन्होंने जान-बूझकर कानून की अज्ञानता को बहाने के रूप में बाहर रखा, ताकि उस दीर्घकालिक विधि-सिद्धांत को प्रतिबिंबित किया जा सके कि प्रत्येक व्यक्ति को कानून का ज्ञाता माना जाता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने निरंतर ‘तथ्य की भूल’ (जो आचरण को माफ कर सकती है) और ‘कानून की भूल’ (जो माफ नहीं करती) में भेद किया है, परंपरागत व्याख्याओं के उदाहरण का अनुसरण करते हुए: यदि कोई व्यक्ति किसी को जंगली जानवर या हमलावर समझकर, वास्तविक और युक्तिसंगत भूल में, मार देता है तो उसे संरक्षण मिल सकता है; पर जो कहे ‘मुझे पता नहीं था कि यह कृत्य गैरकानूनी है’, उसे कोई संरक्षण नहीं। न्यायालयों ने बल दिया है कि वह भ्रम ‘सद्भावना’ में होना चाहिए — अर्थात उचित सावधानी और ध्यान के साथ, न कि लापरवाही या उतावलेपन से — और यह भी कि व्यक्ति वास्तव में वैध रूप से कार्य करने का प्रयास कर रहा था, न कि बाद में केवल अज्ञानता का दावा कर रहा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी कानून के अस्तित्व का न जानना, धारा 79 के तहत उसका उल्लंघन करने के लिए माफ़ी बन सकता है।

    तथ्य: धारा 79 स्पष्ट रूप से कानून की भूल को बाहर रखती है — केवल तथ्यों के बारे में वास्तविक, सद्भावना-युक्त भूल ही आचरण को माफ कर सकती है।

  • मिथक: कोई भी भूल-भरोसा, चाहे जितनी भी लापरवाही भरा हो, संरक्षित है।

    तथ्य: न्यायालय यह अपेक्षा करते हैं कि भ्रम ‘सद्भावना’ में हो, जिसका अर्थ है उचित सावधानी और ध्यान के साथ, न कि लापरवाही या उतावलेपन से।

  • मिथक: यह धारा निजी नागरिकों को जो चाहे, जैसा वे उचित समझें, करने की छूट देती है।

    तथ्य: विश्वास यह होना चाहिए कि व्यक्ति ‘कानून द्वारा’ विशेष रूप से औचित्य प्राप्त है — केवल एक धुंधला निजी नैतिक औचित्य पर्याप्त नहीं है।