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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 78

repealed

Act done pursuant to the judgment or order of Court

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह अनुभाग उन लोगों की रक्षा करता है — जैसे पुलिस अधिकारी, जेल कर्मचारी, या सामान्य नागरिक — जो न्यायालय के निर्देश पर कार्य करते हैं। न्यायालय कभी‑कभी अपने क्षेत्राधिकार (jurisdiction) को लेकर भूल कर सकते हैं, परंतु आदेश का पालन करने वाले से सामान्यतः यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह स्वतंत्र रूप से न्यायालय की विधिक प्राधिकारिता की जांच‑परख करे। कानून ऐसी सद्भावनापूर्ण अनुपालन को सुरक्षा देता है ताकि लोग न्यायिक तंत्र पर विश्वास करने के लिए दंडित न हों, और साथ ही यह अपेक्षा भी रखता है कि सद्भावना वास्तविक हो (अंधा या लापरवाह विश्वास नहीं)।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि धारा 78 के तहत संरक्षण तभी मिलता है जब व्यक्ति ने ईमानदारी और उचित सावधानी के साथ कार्य किया हो, और सचमुच यह विश्वास किया हो कि न्यायालय को क्षेत्राधिकार प्राप्त है — महज़ सद्भावना का दावा पर्याप्त नहीं; उसे तर्कसंगत आचरण से सिद्ध करना होता है। न्यायालयों ने इसे धारा 77 (न्यायाधीशों के कृत्यों) से अलग माना है, यह कहते हुए कि धारा 78 उन व्यक्तियों को कवर करती है जो न्यायिक आदेशों का पालन या क्रियान्वयन करते हैं, जैसे पुलिस अधिकारी या जेल अधिकारी, न कि स्वयं न्यायाधीश।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 78 किसी भी ऐसे व्यक्ति को संरक्षण देती है जो केवल यह कह दे कि उसे ‘पता नहीं था’ कि न्यायालय के पास शक्ति नहीं थी।

    तथ्य: न्यायालय वास्तविक सद्भावना की मांग करते हैं — यानी ईमानदार तथा उचित सावधानी से बनी धारणा, न कि केवल ज्ञान‑अभाव का दावा।

  • मिथक: यह अनुभाग स्वयं न्यायाधीशों को उनके गलत निर्णयों के लिए संरक्षण देता है।

    तथ्य: धारा 78 उन लोगों को संरक्षण देती है जो न्यायालय के आदेश का पालन या उस पर कार्य करते हैं (जैसे अधिकारी), न कि वे न्यायाधीश जो आदेश पारित करते हैं — न्यायाधीशों के लिए अलग से धारा 77 लागू होती है।