Indian Penal Code, 1860
धारा 77
repealedAct of Judge when acting judicially
Nothing is an offence which is done by a Judge when acting judicially in the exercise of any power which is, or which in good faith he believes to be, given to him by law.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायाधीशों को कानून की व्याख्या करने, साक्ष्यों का आकलन करने और निर्णय देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, ताकि ईमानदार भूलों के लिए व्यक्तिगत रूप से अभियोजन का भय उनके ऊपर न रहे। उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन आईपीसी के निर्माताओं द्वारा तैयार यह व्यवस्था उस दीर्घकालिक कॉमन-लॉ सिद्धांत को प्रतिबिंबित करती है कि न्यायिक पदाधिकारी, अपने न्यायिक दायरे में सद्भावना से किए गए कृत्यों के लिए प्रतिरक्षा के हकदार हैं, जिससे व्यक्तिगत दायित्व का डर उनके निर्णयों को प्रभावित न करे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय लगातार मानते आए हैं कि यह सुरक्षा केवल ‘न्यायिक रूप से’ किए गए कृत्यों पर लागू होती है — अर्थात, न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया में, न कि प्रशासनिक या निजी कृत्यों पर। न्यायालयों ने ‘सद्भावना’ की शर्त पर भी जोर दिया है: जो न्यायाधीश भ्रष्ट आचरण करे, द्वेष से काम ले, या अपने अधिकार में वास्तविक विश्वास के बिना कार्य करे, वह इस सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता। इस प्रावधान को अक्सर Judicial Officers’ Protection Act, 1850 और न्यायिक प्रतिरक्षा पर बाद के निर्णयों के साथ पढ़ा जाता है, जो स्पष्ट करते हैं कि प्रतिरक्षा निरपेक्ष नहीं है, बल्कि ईमानदार न्यायिक कार्य के साथ ही जुड़ी है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: न्यायाधीशों को अदालत में किए गए किसी भी काम के लिए कभी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
तथ्य: यह सुरक्षा केवल ईमानदार, सद्भावना में किए गए न्यायिक कृत्यों को ही आच्छादित करती है। यह द्वेष, भ्रष्टाचार, या स्पष्टतः किसी भी न्यायिक भूमिका से बाहर किए गए कृत्यों की रक्षा नहीं करती।
मिथक: यह धारा प्रशासनिक निर्णयों, जैसे नियुक्ति या निजी आचरण, के लिए भी न्यायाधीशों को प्रतिरक्षा देती है।
तथ्य: यह सुरक्षा केवल ‘न्यायिक रूप से कार्य करते हुए’ — अर्थात, मामलों का निपटारा करते समय — किए गए कृत्यों पर लागू होती है, न कि प्रशासनिक, निजी या गैर-न्यायिक कृत्यों पर।