Indian Penal Code, 1860
धारा 72
repealedPunishment of person guilty of one of several offences, the judgment stating that it is doubtful of which
In all cases in which judgment is given that a person is guilty of one of several offences specified in the judgment, but that it is doubtful of which of these offences he is guilty, the offender shall be punished for the offence for which the lowest punishment is provided if the same punishment is not provided for all.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
दंड प्रक्रिया में कभी‑कभी यह तो स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति ने गैरकानूनी कृत्य किया, पर उसके सही वैधानिक नाम पर संदेह रह जाता है—जैसे साक्ष्य से यह प्रतीत हो कि या तो चोरी हुई या चुराई गई संपत्ति का बेईमानी से अधिग्रहण, पर स्पष्ट नहीं कि कौन‑सा। आरोपित को केवल तकनीकी अनिश्चितता के कारण मुक्त कर देने या अनुमान लगाकर कठोर दंड देने के जोखिम की बजाय, भारतीय दंड संहिता (IPC) के रचनाकारों ने एक सुरक्षा उपाय रखा: संदेह का लाभ दंड निर्धारण तक विस्तृत हो, ताकि सबसे हलकी लागू सजा दी जाए। यह आपराधिक विधि के सामान्य सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है कि अस्पष्टता अभियुक्त के पक्ष में जाती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने धारा 72 का प्रयोग मुख्यतः चुराई गई संपत्ति से जुड़े मामलों में किया है, जहाँ यह स्पष्ट नहीं रहता कि अभियुक्त स्वयं चोर था या केवल चुराई हुई संपत्ति का बेईमानी से प्राप्तकर्ता। न्यायालयों ने माना है कि जब साक्ष्य दो या अधिक विशिष्ट अपराधों (जो निर्णय में नामित हों) के बीच वास्तविक संदेह छोड़ता है, तो अभियुक्त को वैकल्पिक रूप से दोषसिद्ध कर उस प्रावधान के अंतर्गत दंडित किया जाना चाहिए जिसकी सजा हलकी है; न कि पूरी तरह बरी कर दिया जाए या अपर्याप्त प्रमाण पर अधिक गंभीर आरोप में दोषसिद्ध किया जाए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 72 का मतलब यह नहीं है कि आरोपी भारी अपराध करने पर भी हलके अपराध के सहारे बच निकलता है।
तथ्य: यह धारा तभी लागू होती है जब न्यायालय वास्तव में इस बात को लेकर अनिश्चित हो कि पहले से किसी रूप में सिद्ध सूची में से कौन‑सा विशिष्ट अपराध घटित हुआ—यह किसी स्पष्ट रूप से सिद्ध गंभीर अपराध को घटाकर हलका साबित करने की अनुमति नहीं देती।
मिथक: यह धारा ऐसा नहीं करती कि न्यायाधीश अनिश्चित होने पर मनचाहे किसी भी अपराध के लिए दंड दे सकें।
तथ्य: जिन अपराधों पर विचार है, वे निर्णय में ठोस रूप से नामित होने चाहिए, और चुनी गई सजा उन्हीं विशिष्ट नामित अपराधों में से सबसे कम सजा होनी चाहिए—यह खुली विवेकाधीनता नहीं है।