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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 71

repealed

Limit of punishment of offence made up of several offences

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता के रचनाकारों ने, Lord Macaulay के 1837 के मूल मसौदे के आधार पर (विधि 1860 में बनी), इस बात को रोकना चाहा कि जब एक ही गलत कृत्य स्वाभाविक रूप से अपने भीतर छोटे गलत कृत्य समेटे हो, तो दोष को ‘दोहरा-गिन’ कर दंड न बढ़ा दिया जाए। उदाहरण के लिए, दंड संहिता में डकैती की परिभाषा आंशिक रूप से चोरी के साथ चोट या अवैध अवरोध को जोड़कर बनती है। यदि धारा 71 जैसा नियम न हो, तो अदालत सैद्धांतिक रूप से उसी एक लेन-देन से उपजी चोरी, चोट, और डकैती—तीनों के लिए अलग-अलग दोषसिद्धि और दंड दे सकती थी। धारा 71 इस पर रोक लगाती है: सम्मिलित अपराध के लिए (या उसके किसी एक हिस्से के लिए) दंड दो, उसके सारे हिस्सों को जोड़कर अलग-अलग दंड न दो। यह उस व्यापक निष्पक्षता-सिद्धांत को दर्शाती है कि जो मूलतः एक ही अन्याय है, उसके लिए दंडों का अनावश्यक गुणन न हो; यही विचार संहिता में और भी जगह गूंजता है (देखें धारा 72 और 73, जहाँ संबंधित सज़ा-सीमाएँ दी गई हैं)।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतें सामान्यतः धारा 71 को उन संरचनात्मक रूप से सम्मिलित अपराधों पर ‘दोहरी सज़ा’ के विरुद्ध नियम के रूप में देखती रही हैं—यानी जहाँ बड़े अपराध की परिभाषा उसके घटक छोटे अपराधों से बनती है (दंड संहिता के उदाहरणों में डकैती—जो चोरी तथा चोट या अवैध अवरोध से मिलकर बनती है—क्लासिक मिसाल है)। न्यायिक निर्णयों ने इसे उन स्थितियों से अलग रखा है जहाँ दो अपराध केवल तथ्यों में आंशिक रूप से ओवरलैप करते हों, पर किसी एक परिभाषित अपराध के वास्तविक ‘भाग’ न हों—ऐसी स्थिति में धारा 71 लागू नहीं होती और अलग-अलग दंड सम्भव रहते हैं। अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जहाँ कोई अन्य विधि या उपबंध समान आचरण पर संचयी दंड को स्पष्ट रूप से अनुमति देता है, वहाँ यह नियम पीछे हट जाता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 71 का मतलब यह नहीं है कि एक ही घटना के लिए कभी एक से अधिक अपराधों में आरोप ही नहीं लगाया जा सकता।

    तथ्य: यह सीमा केवल तब लागू होती है जब किसी एक अपराध की परिभाषा कानूनी रूप से उसके घटक अपराधों से मिलकर बनी हो (जैसे डकैती में चोरी और अवरोध निहित हों)। यदि अपराध अलग-अलग हों और किसी एक सम्मिलित अपराध के ‘भाग’ न हों, तो बहु-दंड अब भी संभव है।

  • मिथक: धारा 71 हमेशा अन्य उन विधियों पर प्रधानता नहीं पाती जो बहु-दंड की अनुमति देती हैं।

    तथ्य: धारा स्वयं कहती है कि यह सीमा ‘जब तक कि इसके विपरीत स्पष्ट प्रावधान न हो’ तब तक लागू है—अर्थात कोई अन्य कानून या उपबंध वैध रूप से संचयी दंड की अनुमति दे सकता है।