Indian Penal Code, 1860
धारा 66
repealedDescription of imprisonment for non-payment of fine
The imprisonment which the Court imposes in default of payment of a fine may be of any description to which the offender might have been sentenced for the offence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
सन् 1860 का भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) दंडों की स्तरीकृत व्यवस्था लायी, जिसमें जुर्माने भी शामिल थे, और यह आवश्यक था कि जुर्मानों की वसूली सुनिश्चित करने का कोई तंत्र हो। धारा 66 यह स्पष्ट करती है कि जब न्यायालय ‘डिफ़ॉल्ट कारावास’ (जुर्माना न भरने पर अतिरिक्त कैद) देता है, तो वह किसी हल्की कैद तक सीमित नहीं है — वह उसी प्रकार की कैद दे सकता है जिसकी अनुमति उस विशिष्ट अपराध के दंड प्रावधान में है, ताकि जुर्माने का प्रतिरोधक प्रभाव कमजोर न पड़े।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि मूल सज़ा केवल जुर्माने की थी (कोई कैद नहीं), तो जुर्माना न भरने पर डिफ़ॉल्ट कारावास भी ‘हल्का’ या साधारण ही होना चाहिए।
तथ्य: अदालतें धारा 66 को इस अर्थ में पढ़ती हैं कि डिफ़ॉल्ट कारावास का प्रकार (साधारण या कठोर) इस बात पर निर्भर करता है कि अपराध के दंड-विधान में क्या अनुमति है, न कि इस पर कि वास्तविक रूप से कौन-सी सज़ा दी गई थी।
मिथक: धारा 66 कोई नई सज़ा निर्मित नहीं करती।
तथ्य: यह केवल जुर्माना न भरने पर दी जा सकने वाली कैद के ‘प्रकार’ का वर्णन करती है; ऐसे डिफ़ॉल्ट कारावास कब और कितने समय के लिए दिए जा सकते हैं, यह अन्य धाराएँ (जैसे धारा 64) नियंत्रित करती हैं।