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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 65

repealed

Limit to imprisonment for non-payment of fine, when imprisonment and fine awardable

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

आईपीसी के औपनिवेशिक दौर के प्रारूपकार चाहते थे कि डिफ़ॉल्ट कारावास (सिर्फ़ जुर्माना न चुकाने के कारण दी जाने वाली जेल) एक अनुपातिक बैकअप ही रहे, न कि अपराध के लिए विधायिका द्वारा ठहराई गई सज़ा से छिपकर ज़्यादा दंड देने का साधन बने। धारा 65, धाराओं 63 और 64 के साथ मिलकर काम करती है: जहाँ धारा 64 अदालतों को डिफ़ॉल्ट सज़ा तय करने देती है, वहीं धारा 65 यह सुनिश्चित करती है कि वह डिफ़ॉल्ट सज़ा स्वयं अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास की तुलना में अनुपातहीन रूप से कठोर न हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय अदालतों ने लगातार धारा 65 को वैकल्पिक दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि अनिवार्य अधिकतम सीमा माना है — निचली अदालतों द्वारा एक-चौथाई की सीमा से अधिक तय की गई डिफ़ॉल्ट सज़ाएँ अपील में घटा दी गई हैं या रद्द हुई हैं। अदालतों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सीमा केवल उन्हीं अपराधों पर लागू होती है जिनमें क़ानून कारावास और जुर्माना, दोनों का प्रावधान साथ-साथ करता है; जहाँ किसी प्रावधान में वैकल्पिक रूप से केवल जुर्माने की सज़ा भी संभव है, वहाँ धारा 65 की सीमा उसी तरह लागू नहीं होती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना ग़लत है कि जुर्माना न भरने पर अदालतें किसी भी मात्रा में अतिरिक्त जेल दे सकती हैं।

    तथ्य: जब अपराध में कारावास और जुर्माना, दोनों का प्रावधान हो, धारा 65 उस डिफ़ॉल्ट कारावास को अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास के एक-चौथाई पर सीमित कर देती है।

  • मिथक: यह एक-चौथाई वाली सीमा भारत के हर क़ानून के तहत लगाए गए हर जुर्माने पर लागू नहीं होती।

    तथ्य: यह विशेष रूप से आईपीसी (या उसका संदर्भ लेने वाले प्रावधानों) के अंतर्गत उन अपराधों पर लागू होती है जिनमें कारावास और जुर्माना दोनों का दंड निर्धारित है — न कि अलग-थलग, केवल जुर्माने वाली व्यवस्थाओं के तहत लगाए गए दंडों पर।