Indian Penal Code, 1860
धारा 64
repealedSentence of imprisonment for non-payment of fine
In every case of an offence punishable with imprisonment as well as fine, in which the offender is sentenced to a fine, whether with or without imprisonment, and in every case of an offence punishable with imprisonment or fine, or with fine only, in which the offender is sentenced to a fine.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय अदालतें अक्सर कारावास के स्थान पर, या कारावास के साथ, लोगों को जुर्माने से दंडित करती हैं। परंतु यदि जुर्माना अदा ही न हो तो उसका कोई अर्थ नहीं रहता। 1860 के दशक में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन के अधीन (मुख्यतः लॉर्ड मैकाले की विधि आयोग द्वारा) तैयार भारतीय दंड संहिता को जुर्मानों को प्रभावी बनाने के लिए एक तंत्र चाहिए था। धारा 64 का उद्देश्य अदालतों को यह शक्ति देना था कि वे अदालत द्वारा लगाए गए जुर्माने का भुगतान न करने या इंकार करने पर उस व्यक्ति को कारावास भेज सकें — ताकि अनादिष्ट जुर्माना खोखला आदेश न रह जाए, बल्कि वास्तविक परिणाम में बदले।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यदि कोई अदालत केवल जुर्माना (बिना कारावास) की सजा दे, तो उस अपराध के लिए व्यक्ति कभी भी जेल नहीं जा सकता।
तथ्य: धारा 64 अदालतों को यह अनुमति देती है कि यदि कोई व्यक्ति जुर्माना अदा करने में विफल रहता है, तो उसे कारावास भेजा जा सकता है — भले ही मूल सजा में कारावास शामिल न रहा हो।