Indian Penal Code, 1860
धारा 63
repealedAmount of fine
Where no sum is expressed to which a fine may extend, the amount of fine to which the offender is liable is unlimited, but shall not be excessive.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय दंड संहिता (IPC) के निर्माता, जिनमें मैकॉले शामिल थे, दंड निर्धारण में लचीलापन चाहते थे ताकि जुर्माना अपराधी की परिस्थितियों और अपराध की गंभीरता के अनुसार तय हो, न कि हर अपराध के लिए विधि द्वारा कठोरता से स्थिर किया जाए। साथ ही, असीमित विवेक का दुरुपयोग हो सकता था, इसलिए धारा में एक सुरक्षा-उपाय रखा गया: जुर्माना अत्यधिक नहीं होना चाहिए। यह न्यायिक लचीलापन और मनमाने/दंडात्मक अतिजुर्माने से सुरक्षा के बीच संतुलन बनाता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालय लगातार मानते आए हैं कि ‘असीमित’ का अर्थ ‘बिना नियंत्रण’ नहीं है — जुर्माना अपराध, आरोपी की सामर्थ्य और हुए नुकसान के अनुपात में होना चाहिए। न्यायालयों ने इस धारा को सामान्य दंड सिद्धांतों और मनमानी के विरुद्ध अनुच्छेद 14/21 की चिंताओं के साथ पढ़कर, बेतहाशा असंगत जुर्मानों को रद्द या कम किया है। अपीलीय न्यायालय प्रायः देखते हैं कि विचारण न्यायालय द्वारा तय जुर्माने का औचित्य तथ्यों से सिद्ध है या नहीं, और ‘अत्यधिक नहीं’ को महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि तर्कसंगत अनुपातिकता की निहित शर्त मानते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: ‘असीमित’ जुर्माने का मतलब है कि न्यायालय बिना किसी सवाल के, चाहे जितनी भी भारी राशि वसूल सकते हैं।
तथ्य: न्यायालयों ने ‘अत्यधिक नहीं होगा’ वाले उपबंध को वास्तविक सीमा माना है — जुर्माना संख्या की दृष्टि से भले अबद्ध लगे, पर उसे अनुपातिक और तर्कसंगत होना ही होगा।
मिथक: धारा 63 हर IPC अपराध के लिए जुर्माने की राशि स्वयं तय करती है।
तथ्य: यह केवल तब लागू होती है जब कोई विशेष IPC धारा ‘जुर्माना’ का प्रावधान करती है पर अधिकतम सीमा नहीं बताती; अनेक धाराएँ पहले से अपनी जुर्माना-सीमाएँ निर्धारित करती हैं, और वे इस सामान्य नियम पर वरीयता रखती हैं।